# सखि कै गयो बंटाढार यार

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-ras-2005:yugal-ras-2005-kirtan-064
Canonical page: https://radhey.shreyam1008.com.np/read/yugal-ras-2005/yugal-ras-2005-kirtan-064/
Book: Yugal Ras
Source edition: 16-hi-2005; SHA-256 4bb470b1f96249e40eb21d96cd2bb6b8eec203f5ed370df4843197140ad5ea16
Source PDF pages: 136–137



<a id="line-1"></a>सखि कै गयो बंटाढार यार  
<a id="line-2"></a>हौँ कालि लखति रहि यमुन धार।  
<a id="line-3"></a>आयो तहँ झूमत झुकत यार।  
<a id="line-4"></a>पूछ्यो सखि तू इत का निहार।  
<a id="line-5"></a>यह सुनि हौँ हूँ सखि लख्यो यार।  
<a id="line-6"></a>सो मोहिं निहार हौँ तेहिँ निहार।  
<a id="line-7"></a>ह्वै गये मिलि द्वै द्वै दृगन चार।  
<a id="line-8"></a>दिय नैनन सैनन बान मार।  
<a id="line-9"></a>हौँ ह्वै गइ घायल सुधि बिसार।  
<a id="line-10"></a>जाने वाने का जादु डार।  
<a id="line-11"></a>जित देखूँ दीखे सोइ यार।  
<a id="line-12"></a>अब विकल न कल पल बिनुहिं यार।  
<a id="line-13"></a>कासोँ कह है यह प्यार जार।  
<a id="line-14"></a>पुनि पुनि तनु काँपे सोचि यार।  
<a id="line-15"></a>लागे सुत पति सब सुख असार।  
<a id="line-16"></a>कबहुँक दृग आनँद जल फुहार।  
<a id="line-17"></a>कबहुँक दृग विरह अश्रुजल धार।  
<a id="line-18"></a>ज्यों ज्यों बिसरावति सुरति यार।  
<a id="line-19"></a>त्यों त्यों अति आवति सुरति जार।  
<a id="line-20"></a>सखि अब कैसे निज प्राण धार।  
<a id="line-21"></a>कैसे सोइ पुनि मिल मेरो यार।  
<a id="line-22"></a>लै प्राण “कृपालु” मिलाउ यार।  
<a id="line-23"></a>जा पर दिय तन मन प्रान वार॥

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-24"></a>भावार्थ—किसी ब्रजगोपी ने अपनी अन्तरंग सखी से  
<a id="line-25"></a>आप बीती घटना का वर्णन करते हुए कहा-अरी सखी! आज  
<a id="line-26"></a>तो मेरे प्राणसखा कृष्ण ने मेरा सर्वस्व लूट लिया। मैं कल यमुना  
<a id="line-27"></a>के कूल पर खड़ी हुई धारा की ओर देख रही थी। वहाँ अचानक  
<a id="line-28"></a>न जाने कहाँ से झुक झुक कर झूमते हुए नंदनंदन आ गये।  
<a id="line-29"></a>उन्होंने मुझसे प्रश्न किया- अरी सखी ! तू इधर क्या देख रही  
<a id="line-30"></a>है? यह सुनकर मैंने श्री कृष्ण की ओर देखा। वे मुझे देख रहे  
<a id="line-31"></a>थे, मैं उन्हें देखने लगी। हमारे नेत्र अचानक चार हो गये।  
<a id="line-32"></a>मनमोहन कृष्ण ने अपने नेत्रों के कटाक्ष पात रूपी बाणों से मुझे  
<a id="line-33"></a>घायल कर दिया। मैं तन मन की सुधि भूल गई। न जाने उन्होंने  
<a id="line-34"></a>मुझ पर क्या जादू कर दिया। अब तो जिधर देखती हूँ, प्रियतम  
<a id="line-35"></a>कृष्ण ही दिखाई देते हैं। अब तो प्रियतम के बिना एक क्षण को  
<a id="line-36"></a>भी चैन नहीं पड़ता। इस कृष्ण रूपी पर-पुरुष की प्रीति को  
<a id="line-37"></a>किसी से कह भी नहीं सकती। प्रियतम का चिंतन कर शरीर  
<a id="line-38"></a>बार बार काँपने लगता है। पति-पुत्र का सुख खारा प्रतीत होता  
<a id="line-39"></a>है। कभी तो नेत्रों से आनन्द के आँसुओं की झड़ी लग जाती हैं  
<a id="line-40"></a>कभी विरह के उष्ण अश्रु झरते हैं। जैसे जैसे प्रियतम को भूलना  
<a id="line-41"></a>चाहती हूँ वैसे वैसे और अधिक स्मृति होती है। अब जीवन  
<a id="line-42"></a>कैसे व्यतीत करुँगी? मेरा प्राण-प्रियतम पुनः कब किस प्रकार  
<a id="line-43"></a>प्राप्त होगा?“कृपालु”के शब्दों में सखी अपनी सखी से कहती  
<a id="line-44"></a>है- मैंने जिस पर अपना तन, मन, प्राण निछावर किया है- मेरे  
<a id="line-45"></a>प्राण लेकर भी कोई मुझे उस प्रियतम से मिला दे।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

[Previous](https://radhey.shreyam1008.com.np/read/yugal-ras-2005/yugal-ras-2005-kirtan-063/) · [Next](https://radhey.shreyam1008.com.np/read/yugal-ras-2005/yugal-ras-2005-kirtan-065/)

[Book contents](https://radhey.shreyam1008.com.np/read/yugal-ras-2005/) · [Source editions and protected PDF](https://radhey.shreyam1008.com.np/books/yugal-ras/)

Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
