# चंचल चल हट तजु अंचल पट,

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-ras-2005:yugal-ras-2005-kirtan-051
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Book: Yugal Ras
Source edition: 16-hi-2005; SHA-256 4bb470b1f96249e40eb21d96cd2bb6b8eec203f5ed370df4843197140ad5ea16
Source PDF pages: 112–114



<a id="line-1"></a>चंचल चल हट तजु अंचल पट,  
<a id="line-2"></a>तू तो सब सों ही कर खटपट नटखट।  
<a id="line-3"></a>तेरे रोम रोम भरो है कपट नटखट,  
<a id="line-4"></a>तोहिं लोक लाज डर नहिं नेकु निपट।  
<a id="line-5"></a>काउ ब्रजगोरी को तू फोरे काँकरि घट,  
<a id="line-6"></a>काउ ब्रजगोरी को तू तोरे लर नटखट।  
<a id="line-7"></a>काउ घर चोरे तू तो माखन नटखट,  
<a id="line-8"></a>तोय पकरि न पावे कोउ भाजे झटपट।  
<a id="line-9"></a>कभु पकरि जो पाये तोहिं कोउ नटखट,  
<a id="line-10"></a>कछु जादू करि बनि जाय वाको पति झट।  
<a id="line-11"></a>मारे तकि तकि दृग बानन नटखट,  
<a id="line-12"></a>काउ चुनरि उतारे फारे कंचुकि पट।  
<a id="line-13"></a>तेरी माया से तो हारे विधि हरि हर नट,

<a id="line-14"></a>तोहिं जाने सोइ जाको तू जनाये नटखट।  
<a id="line-15"></a>तोरे गुरु दुर्वासा ने बताया नटखट।  
<a id="line-16"></a>तू है हरि अवतारी आया धरि तनु नट।  
<a id="line-17"></a>हम मानें नहिं तोहिं अवतारी नटखट,  
<a id="line-18"></a>हम मानें तोहिं निलज निपट लम्पट।  
<a id="line-19"></a>इतने में आये जाने कित ते “कृपालु” झट,  
<a id="line-20"></a>बोले प्रेम की कुटिल गति अति अटपट।

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-21"></a>भावार्थ— किसी ब्रजगोपी ने श्रीकृष्ण से प्रेम की  
<a id="line-22"></a>अटपटी भाषा में कहा-अरे चंचल! दूर हटो। मेरे वस्त्र को  
<a id="line-23"></a>छोड़ दो। हे नटखट! तुम्हारे लिये मैं अकेली तो हूँ नहीं तुम तो  
<a id="line-24"></a>सभी गोपियों के साथ प्रेम की खींचातानी करते रहते हो। तुम्हारे  
<a id="line-25"></a>प्रत्येक रोम में छल-छिद्र भरा है। न तो तुम संसार की मर्यादा  
<a id="line-26"></a>को ही मानते हो, न तुम्हें किसी का लेशमात्र भय है। जब कोई  
<a id="line-27"></a>ब्रजगोपी यमुना तट पर जल भरने जाती है, तब तुम कंकड़  
<a id="line-28"></a>मारकर उसका घड़ा फोड़ देते हो। कभी किसी के गले की  
<a id="line-29"></a>माला तोड़ देते हो। अरे कृष्ण! तुम किसी गोपी के घर जाकर  
<a id="line-30"></a>उसका माखन चुराते हो। यदि कोई गोपी तुम्हें पकड़ना चाहे तो  
<a id="line-31"></a>बड़ी शीघ्रता से भाग जाते हो। यदि कदाचित् कभी किसी ने  
<a id="line-32"></a>पकड़ भी लिया तो योगमाया द्वारा उसके पति का रूप धारण  
<a id="line-33"></a>कर लेते हो। यदि कोई गोपी तुमसे उदासीन रहती है तो नेत्रों  
<a id="line-34"></a>के कटाक्षपात से उसे घायल कर अपने वशीभूत कर लेते हो।  
<a id="line-35"></a>किसी के सिर से चुनरी उतारकर कंचुकी फाड़ देते हो। हे  
<a id="line-36"></a>अद्भुत नट! तुम्हारी विचित्र माया से तो सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, विष्णु

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-37"></a>एवं शिव भी पराजित हो गये। हे नटखट! कोई तुम्हें जान भी  
<a id="line-38"></a>तो नहीं सकता। जिसे तुम स्वयं को जनाना चाहो, वही तुम्हें  
<a id="line-39"></a>जान सकता है।““सोइ जानइ जेहि देहु जनाई””।तुम्हारे गुरु दुर्वासा  
<a id="line-40"></a>द्वारा ज्ञात हुआ कि तुम ही अवतारों के अवतारी श्री हरि हो।  
<a id="line-41"></a>मानव शरीर धारण कर जगत्-कल्याण के निमित्त ही तुम अपना  
<a id="line-42"></a>दिव्य धाम त्यागकर हमारे मध्य आये हो। इतना सब तो सत्य  
<a id="line-43"></a>है परन्तु गोपियाँ तुम्हारे भगवान् रूप को स्वीकार नहीं करती।  
<a id="line-44"></a>गोपियाँ तो तुम्हें लम्पट ही मानती हैं। इसी बीच कहीं से  
<a id="line-45"></a>“कृपालु” ने आकर कहा- प्रेम की अटपटी गति अत्यन्त ही  
<a id="line-46"></a>टेढ़ी है।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
