# तू प्रियतम मैं प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-ras-2005:yugal-ras-2005-kirtan-028
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Book: Yugal Ras
Source edition: 16-hi-2005; SHA-256 4bb470b1f96249e40eb21d96cd2bb6b8eec203f5ed370df4843197140ad5ea16
Source PDF pages: 67–69



<a id="line-1"></a>तू प्रियतम मैं प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।  
<a id="line-2"></a>प्राण जाँय भल पै व्रत प्यारी,  
<a id="line-3"></a>छुटै न तो सन यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।  
<a id="line-4"></a>प्रियतम सेवा ही चह प्यारी,  
<a id="line-5"></a>चाह न और हमारी, प्यारी प्यारी प्यारी।  
<a id="line-6"></a>काहुहिँ भुक्ति मुक्ति लग प्यारी,  
<a id="line-7"></a>मोहिं लग प्यारी यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।  
<a id="line-8"></a>गुण लखि प्यार न कर यह प्यारी,  
<a id="line-9"></a>है अकाम मम यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।  
<a id="line-10"></a>क्षण क्षण वर्धमान यह यारी,  
<a id="line-11"></a>जानि न सक संसारी, प्यारी प्यारी प्यारी।  
<a id="line-12"></a>मूकास्वादनवत् यह यारी,  
<a id="line-13"></a>कहि न सकत श्रुतिचारी, प्यारी प्यारी प्यारी।  
<a id="line-14"></a>देना देना ही है यारी,  
<a id="line-15"></a>लेना जान न प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।  
<a id="line-16"></a>मान न मान मोहिं तू प्यारी,  
<a id="line-17"></a>घटै न याते यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

<a id="line-18"></a>जल जलनिधि सम है मम यारी,  
<a id="line-19"></a>दोउ इक प्रियतम प्यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।  
<a id="line-20"></a>जो “कृपालु” चह पिय सुख प्यारी,  
<a id="line-21"></a>जानु साँचु सोइ यारी, प्यारी प्यारी प्यारी।

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-22"></a>भावार्थ—भक्त अपने इष्ट के प्रति अपने हृदय के  
<a id="line-23"></a>भाव प्रकट करते हुए कहता हैं- हे प्रियतम कृष्ण! तुम मेरे  
<a id="line-24"></a>वास्तविक प्रियतम हो और मैं एकमात्र तुम्हारी ही प्रेयसी हूँ।  
<a id="line-25"></a>मेरा यह प्रण है कि प्राण भले ही ही चले जायें परन्तु तुम्हारे  
<a id="line-26"></a>साथ मेरा प्रेम सम्बन्ध कभी छिन्न नहीं होगा। यह प्रेयसी केवल  
<a id="line-27"></a>तुम्हारी सेवा ही चाहती है, मेरी अपनी कोई इच्छा नहीं है।  
<a id="line-28"></a>किसी को भुक्ति, मुक्ति अच्छी लगती होंगी परन्तु मुझे तो तुम्हारे  
<a id="line-29"></a>प्रेम में ही सुख मिलता है। यह प्रेयसी तुमसे निष्काम प्रेम करती  
<a id="line-30"></a>है। मेरा प्रेम तुम्हारे किसी गुण के कारण नहीं है। मेरी प्रीति के  
<a id="line-31"></a>रहस्य को कोई भी सांसारिक व्यक्ति नहीं समझ सकता क्योंकि  
<a id="line-32"></a>यह प्रीति प्रतिक्षण वृद्धि को प्राप्त होती है।““गुणरहितं कामनारहितं  
<a id="line-33"></a>प्रतिक्षणवर्द्धमानम्।””(नारदभक्ति सूत्र) ““मूकास्वादनवत्”” होने  
<a id="line-34"></a>के कारण चारों वेद इस प्रीति-रीति का वर्णन करने में असमर्थ  
<a id="line-35"></a>हैं। ““नारद भक्ति सूत्र”” में कहा गया हैं- ““अनिर्वचनीयं  
<a id="line-36"></a>प्रेमस्वरूपम्, मूकास्वादनवत्”” प्रेम में देना ही देना है प्रेमी कभी  
<a id="line-37"></a>कुछ लेना नहीं चाहता। तुम भले ही मुझे अपनी प्रेयसी स्वीकार  
<a id="line-38"></a>न करो, इससे मेरा प्रेम न्यूनता को प्राप्त नहीं होगा। जिस प्रकार  
<a id="line-39"></a>समुद्र और समुद्र का जल अभिन्न है उसी प्रकार मैं तुमसे

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-40"></a>अभिन्न हूँ।“कृपालु”कहते हैं- जो प्रेयसी प्रियतम का सुख  
<a id="line-41"></a>चाहती है उसी का प्रेम वास्तविक प्रेम है।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
