# आज मैं सुनावूँ खोटी खरी कछु छलिया,

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-ras-2005:yugal-ras-2005-kirtan-027
Canonical page: https://radhey.shreyam1008.com.np/read/yugal-ras-2005/yugal-ras-2005-kirtan-027/
Book: Yugal Ras
Source edition: 16-hi-2005; SHA-256 4bb470b1f96249e40eb21d96cd2bb6b8eec203f5ed370df4843197140ad5ea16
Source PDF pages: 65–67



<a id="line-1"></a>आज मैं सुनावूँ खोटी खरी कछु छलिया,  
<a id="line-2"></a>सच लागे कडुवा जगत जाने छलिया।  
<a id="line-3"></a>चारों वेदों में कहा है तूने यह छलिया,  
<a id="line-4"></a>मैं हूंँ अंशी मेरे अंश जीव सब छलिया।  
<a id="line-5"></a>कोऊ सुधा सिन्धु चाहे पूरा पिये छलिया,  
<a id="line-6"></a>चाहे चुल्लू भर पिये फल इक छलिया।  
<a id="line-7"></a>अंशी गुण अंश में भी रहें सब छलिया,  
<a id="line-8"></a>पुनि तेरे गुण मुझमें न काहे छलिया।  
<a id="line-9"></a>तू तो विभु अग जग व्यापक छलिया,  
<a id="line-10"></a>मैं तो अणु तनु में ही व्यापक छलिया।  
<a id="line-11"></a>तू तो पूर्ण ज्ञानमय रहे नित छलिया,  
<a id="line-12"></a>मैं तो सर्वदा ही अल्प ज्ञानमय छलिया।  
<a id="line-13"></a>तू तो दिव्य आनँद युत रहे छलिया,  
<a id="line-14"></a>मैं तो अगनित दुख युत रहूँ छलिया।  
<a id="line-15"></a>तू तो सब का ही है नियामक छलिया,  
<a id="line-16"></a>मैं तो हूँ नियम्य तेरी माया का भी छलिया।  
<a id="line-17"></a>तू तो माया को नचावे मायाधीश छलिया,  
<a id="line-18"></a>मैं तो तेरी मायावश नाचूँ नित छलिया।  
<a id="line-19"></a>तू तो है स्वतंत्र सर्वशक्ति युत छलिया,  
<a id="line-20"></a>मैं तो परवश अल्पशक्ति युत छलिया।  
<a id="line-21"></a>तू तो शुद्ध बुद्ध नित्य युक्त रहे छलिया,  
<a id="line-22"></a>मैं तो कर्मबन्धन युत नित छलिया।  
<a id="line-23"></a>यदि हूंँ मैं तेरा तो दे निज गुण छलिया,  
<a id="line-24"></a>या तो तू “कृपालु” कहु झूठी श्रुति छलिया।

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-25"></a>भावार्थ—भक्त प्रेम की अटपटी भाषा में अपने इष्ट  
<a id="line-26"></a>को उलाहना देते हुए कहता है- हे छली कृष्ण! आज मैं भी  
<a id="line-27"></a>तुम्हें कुछ खोटी खरी सुनाने को विवश हो गया हूँ। हे श्यामसुन्दर!  
<a id="line-28"></a>संसार भी जानता है कि सत्य बड़ा कटु होता है। तुमने चारों  
<a id="line-29"></a>वेदो में यह घोषणा की है कि तुम अंशी हो एवं जीव तुम्हारे  
<a id="line-30"></a>अंश हैं। कोई अमृत का पूरा समुद्र पी ले अथवा अंजली भर  
<a id="line-31"></a>कर पिये तो फल एक ही होगा। अंशी के समस्त गुण अंश में  
<a id="line-32"></a>भी रहते हैं। मैं तुमसे प्रश्न करता हूँ कि तुम्हारे गुण मुझमें क्यों  
<a id="line-33"></a>नहीं हैं? तुम विभु होने के कारण सर्वत्र जग में व्यापक हो  
<a id="line-34"></a>किंतु मैं अणु होने के कारण केवल शरीर में ही व्यापक हूँ। हे  
<a id="line-35"></a>छलियों के शिरोमणि! तुम तो निरन्तर ज्ञान से पूर्ण रहते हो  
<a id="line-36"></a>किंतु मैं तो सदा ही अल्प ज्ञान से युक्त हूँ। तुम सदा सर्वदा  
<a id="line-37"></a>दिव्य आनन्द से परिपूर्ण हो और मैं निरन्तर असंख्य दुख झेल  
<a id="line-38"></a>रहा हूँ। तुम सबके नियामक हो और मैं तुम्हारी दासी माया  
<a id="line-39"></a>द्वारा भी शासित हो रहा हूँ। हे छल बल से परिपूर्ण श्यामसुन्दर!  
<a id="line-40"></a>तुम मायाधीश होने के कारण माया को नचा रहे हो और मैं  
<a id="line-41"></a>मायाधीन होने के कारण तुम्हारी माया द्वारा नचाया जा रहा हूँ।  
<a id="line-42"></a>हे छली सम्राट! तुम सर्व शक्तिमान होने के कारण सदा स्वतन्त्र  
<a id="line-43"></a>हो। नारद जी ने कहा कि परम स्वतन्त्र न सिर पर कोई। किंतु  
<a id="line-44"></a>मैं अल्प शक्तियुक्त होने के कारण सर्वथा परतन्त्र हूँ। तुम सदा  
<a id="line-45"></a>शुद्ध बुद्ध हो किंतु मैं कर्म- परवश होने के कारण बन्धन में हूँ।  
<a id="line-46"></a>यदि तुम यह कहते हो- ““मैं तुम्हारा हूँ””““ममैवांशो जीव लोके-  
<a id="line-47"></a>--”” (गीता)तो अपने सभी गुण मुझे भी प्रदान करो। यदि तुम

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-48"></a>मुझे अपने समान नहीं बना लेते हो तो फिर यह कहो कि  
<a id="line-49"></a>तुम्हारे वेद पुराण सब झूठे हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
