# धन धन गोपीजन प्रेमधन धन धन,

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-ras-2005:yugal-ras-2005-kirtan-015
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Book: Yugal Ras
Source edition: 16-hi-2005; SHA-256 4bb470b1f96249e40eb21d96cd2bb6b8eec203f5ed370df4843197140ad5ea16
Source PDF pages: 42–44



<a id="line-1"></a>धन धन गोपीजन प्रेमधन धन धन,  
<a id="line-2"></a>धन धन त्रिभुवन गोपीजन धन धन।

<a id="line-3"></a>जेहि श्रुति कह अज सत चित सुख घन,  
<a id="line-4"></a>सोइ बन्यो ब्रज यशुमति नँदनंदन।  
<a id="line-5"></a>जेहि श्रुति कह निर्लेप निरंजन,  
<a id="line-6"></a>सोइ बन्यो ब्रज ब्रजबनितन अंजन।  
<a id="line-7"></a>जेहि श्रुति कह नित तृप्त नँदनंदन,  
<a id="line-8"></a>सोइ रो के कहे मैया दे दे टुक माखन।  
<a id="line-9"></a>जेहि श्रुति कह पूर्णकाम नँदनंदन,  
<a id="line-10"></a>सोइ करे रास ब्रज सँग ब्रज बनितन।  
<a id="line-11"></a>श्रुति कह डरे डर डर नँदनंदन,  
<a id="line-12"></a>सोइ जरासंध भय भाज्यो भयभंजन।  
<a id="line-13"></a>जेहि श्रुति कह पूर्णब्रह्म नँदनंदन,  
<a id="line-14"></a>सोइ नाचे छाछ हित ब्रज ढिग गोपीजन।  
<a id="line-15"></a>जेहि श्रुति कह सर्वज्ञ नँदनंदन,  
<a id="line-16"></a>सोइ पढ़े उज्जयन क ख ग घ अक्षरन।  
<a id="line-17"></a>श्रुति कह जग चालक नँदनंदन,  
<a id="line-18"></a>सोइ सीखे चलनो यशोमति आँगन।  
<a id="line-19"></a>जेहि कर श्रुति अस्तुति नँदनंदन,  
<a id="line-20"></a>सोइ गारी खाने जाय घर ब्रज गोपीजन।  
<a id="line-21"></a>जेहि कह श्रुति अग्राह्य नँदनंदन,  
<a id="line-22"></a>सोइ बँध्यो ऊखल यशुमति आँगन।  
<a id="line-23"></a>जेहि कह श्रुति हैं “कृपालु” नँदनंदन,  
<a id="line-24"></a>सोइ कृपा माँगे आगे राधा गहवर वन॥

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-25"></a>भावार्थ—ब्रज-गोपियों का प्रेम धन्य है। तीनों लोकों  
<a id="line-26"></a>में ब्रज-गोपियों का प्रेम धन्य है। तीनों लोकों में ब्रज-गोपियों  
<a id="line-27"></a>का जीवन ही धन्य है। जिसको वेद अज एवं सत् चित् सुखघन  
<a id="line-28"></a>स्वरूप कहता है वही ब्रह्म ब्रज में यशोदा और नंद का पुत्र  
<a id="line-29"></a>बना। जिसे वेद निर्लेप और निरंजन कहता है वही ब्रज में  
<a id="line-30"></a>ब्रजगोपियों के नेत्रों का अंजन बन गया। वेद जिसे नित्यतृप्त  
<a id="line-31"></a>कहता है वह यशोदा से रोकर मक्खन माँगता है। जिसे वेद  
<a id="line-32"></a>पूर्णकाम बतलाता है वही ब्रजमंडल में गोपियों के साथ रास-  
<a id="line-33"></a>विहार करता है। वेद कहता है कि श्री कृष्ण के भय से भय भी  
<a id="line-34"></a>भयभीत होता है वही भय को नष्ट करने वाले कृष्ण जरासंध  
<a id="line-35"></a>के भय से भागकर द्वारिका के किले में छिपे। जिसे वेद पूर्णब्रह्म  
<a id="line-36"></a>कहता है वही नंदपुत्र कृष्ण ब्रज में किंचित् छाछ के हेतु गोपियों  
<a id="line-37"></a>के घरों में नृत्य कर रहा है। जिसे वेद सर्वज्ञ कहता है, वही  
<a id="line-38"></a>उज्ज्ौन में जाकर गुरु के निकट क ख ग आदि अक्षर पढ़ रहा  
<a id="line-39"></a>है। वेद कहता है कि श्री कृष्ण सारे जग को चलाते हैं। वही  
<a id="line-40"></a>कृष्ण यशोदा के आंगन में चलना सीख रहा है। वेद जिन श्री  
<a id="line-41"></a>कृष्ण की स्तुति करता है। वे ही कृष्ण गाली खाने के लिये  
<a id="line-42"></a>गोपियों के घर जाते हैं। जिन श्री कृष्ण को वेद अग्राह्य कहता  
<a id="line-43"></a>है वही दामोदर यशोदा के आँगन में ऊखल से बँधे हुए खड़े  
<a id="line-44"></a>हैं। जिसे वेद कृपालु बताता है वहीं कृष्ण गह्वरवन में श्री राधा  
<a id="line-45"></a>से कृपा की याचना करते हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
