# कैसे कोउ जाने तोहिँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-ras-2005:yugal-ras-2005-kirtan-010
Canonical page: https://radhey.shreyam1008.com.np/read/yugal-ras-2005/yugal-ras-2005-kirtan-010/
Book: Yugal Ras
Source edition: 16-hi-2005; SHA-256 4bb470b1f96249e40eb21d96cd2bb6b8eec203f5ed370df4843197140ad5ea16
Source PDF pages: 32–35



<a id="line-1"></a>कैसे कोउ जाने तोहिँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-2"></a>तू तो महायोगी महाभोगी भी है कान्हा,  
<a id="line-3"></a>कर्ता भी अकर्ता भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-4"></a>तू तो अविभक्त विभक्त भी है कान्हा,  
<a id="line-5"></a>दृश्य भी अदृश्य भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-6"></a>तू तो परिच्छिन्न भी है विभु भी है कान्हा,  
<a id="line-7"></a>निरपेक्ष सापेक्ष कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-8"></a>तू तो पूर्णकाम भी सकाम भी है कान्हा,  
<a id="line-9"></a>जन्मा अजन्मा भी कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-10"></a>तू तो भक्तवश भी स्वतंत्र भी है कान्हा,  
<a id="line-11"></a>भोरा भी चतुर भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-12"></a>तू तो बद्ध भी है नित्यमुक्त भी है कान्हा,  
<a id="line-13"></a>दीन भी अदीन भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-14"></a>तू तो अप्रमेय भी प्रमेय भी है कान्हा,  
<a id="line-15"></a>गम्य भी अगम्य भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-16"></a>तू तो नित्यतृप्त भी है भूखा भी है कान्हा,  
<a id="line-17"></a>एक भी अनेक भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-18"></a>तू तो जग में भी जग ते परे भी कान्हा,  
<a id="line-19"></a>अज्ञ भी है विज्ञ भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-20"></a>तू तो निराकार साकार भी है कान्हा,  
<a id="line-21"></a>निर्गुण सगुण भी कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-22"></a>तू तो अग्राह्य भी है ग्राह्य भी है कान्हा,

<a id="line-23"></a>चिन्त्य भी अचिन्त्य भी है कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।  
<a id="line-24"></a>तू तो है “कृपालु” अरु न्यायी भी है कान्हा,  
<a id="line-25"></a>तोको जाने तू ही बस कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा॥

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-26"></a>भावार्थ—भक्त भगवान् से कहता है- हे कृष्ण! तुम्हें  
<a id="line-27"></a>कोई कैसे जान सकता है। तुम्हारे विरोधी गुणों के कारण तुम्हारे  
<a id="line-28"></a>कार्य साधारण जीव नहीं समझ सकता। तुम महायोगी भी हो,  
<a id="line-29"></a>महाभोगी भी हो। द्वारिका में सोलह हजार एक सौ आठ विवाह  
<a id="line-30"></a>कर प्रत्येक पत्नी से दस पुत्र उत्पन्न किये। इतने बड़े परिवार  
<a id="line-31"></a>को अपने नेत्रों के समक्ष नष्ट होते देखकर भी तुम विषाद की  
<a id="line-32"></a>छाया से मुक्त रहे। तुम सृष्टि-रचना, पालन आदि का कार्य  
<a id="line-33"></a>करते हुए भी अकर्ता ही रहते हो। कारण तुम कर्तृत्व अभिमान  
<a id="line-34"></a>से रहित हो। तुम एक समय में ही अविभक्त एवं विभक्त भी  
<a id="line-35"></a>रहते हो। तुम एक ही हो, तुम्हारे खंड नहीं होते। अतः अविभक्त  
<a id="line-36"></a>हो किन्तु सबके हृदय में अलग अलग बैठकर उनके कर्मों के  
<a id="line-37"></a>दृष्टा बने रहते हो। यह रूप विभक्त सा जान पड़ता है। भक्ति  
<a id="line-38"></a>और श्रद्धा के नेत्रों से ही तुम्हारा दर्शन होता है, अतः तुम दृश्य  
<a id="line-39"></a>हो किन्तु श्रद्धारहित अभक्त के लिये तुम अदृश्य ही रहते हो।  
<a id="line-40"></a>तुम एकदेशीय भी हो साथ ही व्यापक भी हो। तुम्हें किसी की  
<a id="line-41"></a>अपेक्षा नहीं इसलिये निरपेक्ष हो किंतु भक्त जनों की अपेक्षा  
<a id="line-42"></a>करते हो, अतः सापेक्ष भी हो। तुम पूर्णकाम हो किन्तु भक्तों  
<a id="line-43"></a>की इच्छा पूर्ण करने के लिये सकाम बन जाते हो।““भगवानपि  
<a id="line-44"></a>ता रात्रिः-----।””वेद कहता है ब्रह्म अजन्मा है किंतु पुनः  
<a id="line-45"></a>कहता है वह अनेक प्रकार से जन्म भी लेता है।““अजायमानो

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-46"></a>बहुधा विजायते।””अतः तुम एक समय में जन्मा और अजन्मा  
<a id="line-47"></a>दोनों ही रूप से रहते हो। तुम अपने भक्तों के वश में हो““अहं  
<a id="line-48"></a>भक्त पराधीनो””किंतु सर्वथा स्वतंत्र भी हो।“परम स्वतन्त्र न सिर  
<a id="line-49"></a>पर कोई।”भोले भाले भक्तों के लिये तुम भी भोले भाले हो।  
<a id="line-50"></a>चतुरों के लिये तुम महाचतुर हो। तुम बद्ध भी हो। यशोदा ने  
<a id="line-51"></a>तुम्हें ऊखल से बाँधकर “दामोदर” संज्ञा प्रदान की। भक्तों के  
<a id="line-52"></a>प्रेम बंधन में तो सदा बँधे रहते हो परन्तु स्वभावतः तुम सदा  
<a id="line-53"></a>मुक्त ही हो। अभिमानगलित हो गया है जिनका, ऐसे भक्तों के  
<a id="line-54"></a>समक्ष दीन बनकर उनकी दासता करते हो। वैसे तो तुम सर्वथा  
<a id="line-55"></a>अदीन ही हो। तुम्हें प्रमाणित नहीं किया जा सकता। इसलिये  
<a id="line-56"></a>अप्रमेय हो किंतु भक्ति शास्त्र तुम्हें प्रमाणित भी करते हैं अतः  
<a id="line-57"></a>प्रमेय भी हो। श्रद्धा और विश्वास द्वारा जीव तुम्हें प्राप्त कर  
<a id="line-58"></a>लेता है। नास्तिक के लिये तुम सर्वथा अगम्य हो तुम पूर्णकाम  
<a id="line-59"></a>होने के कारण स्वभावतः तृप्त हो। भक्तों द्वारा निवेदित सूखा  
<a id="line-60"></a>साग, केले के छिलके, जूठे बेर खा लेते हो, अतः भूखे भी हो।  
<a id="line-61"></a>तुम एक हो परन्तु महारास में असंख्य गोपियों के लिये असंख्यों  
<a id="line-62"></a>रूप धारण कर लेते हो, अतः अनेक भी हो। तुम सम्पूर्ण जगत्  
<a id="line-63"></a>में व्यापक हो एवं जगत् से अतीत भी हो। सर्वज्ञ होकर नर रूप  
<a id="line-64"></a>से अल्पज्ञता का नाटक करते हो, अतः तुम अज्ञ और विज्ञ  
<a id="line-65"></a>दोनों ही हो। रामावतार में जानकी-हरण के अवसर पर-  
<a id="line-66"></a>““हे खग मृग हे मधुकर स्रेनी तुम देखी सीता मृग नैनी।””  
<a id="line-67"></a>कहते हुए अल्पज्ञ बनकर साधारण मनुष्यों को भ्रमित किया।  
<a id="line-68"></a>निराकार रूप से सर्वत्र व्यापक होकर साकार रूप से भी प्रकट

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-69"></a>हो जाते हो। तुम प्राकृत गुणों से रहित होने के कारण निर्गुण  
<a id="line-70"></a>हो। अनन्त दिव्य गुणों-करुणा, प्रेम, आनंद से युक्त होने से  
<a id="line-71"></a>सगुण भी हो। श्रद्धाहीन मनुष्य द्वारा तुम्हारे दिव्य लीला चरित्र  
<a id="line-72"></a>आदि सर्वथा अग्राह्य हैं। श्रद्धावान तुम्हें प्राप्त कर लेता हैं, अतः  
<a id="line-73"></a>तुम अग्राह्य एवं ग्राह्य दोनों ही हो। भक्त अपने भावों में तुम्हारे  
<a id="line-74"></a>रूप, गुण आदि का अनुभव करते हैं अतः तुम चिंत्य हो। अभक्त  
<a id="line-75"></a>प्राकृत इन्द्रिय मन, बुद्धि से तुम्हारा चिंतन नहीं कर सकता,  
<a id="line-76"></a>अतः तुम अचिंत्य भी हो। तुम कृपा भी करते हो न्याय भी।  
<a id="line-77"></a>भक्तों पर तो सदैव एकमात्र कृपा ही करते हो। ज्ञानी एवं कर्मीं  
<a id="line-78"></a>को उनके कर्म का फल देकर न्याय करते हो। विरोधी गुणों के  
<a id="line-79"></a>आश्रय होने के कारण तुम्हें केवल तुम ही जानते हो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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