# लखु ब्रज अचरज ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी ज्ञानी।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-ras-2005:yugal-ras-2005-kirtan-009
Canonical page: https://radhey.shreyam1008.com.np/read/yugal-ras-2005/yugal-ras-2005-kirtan-009/
Book: Yugal Ras
Source edition: 16-hi-2005; SHA-256 4bb470b1f96249e40eb21d96cd2bb6b8eec203f5ed370df4843197140ad5ea16
Source PDF pages: 29–31



<a id="line-1"></a>लखु ब्रज अचरज ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी ज्ञानी।  
<a id="line-2"></a>जेहि कह ब्रह्म अजन्मा ज्ञानी,  
<a id="line-3"></a>सोइ नँदनंदन ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी ज्ञानी।  
<a id="line-4"></a>जेहि कह ब्रह्म अतनु सो ज्ञानी,  
<a id="line-5"></a>धर ब्रज नरतनु ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी ज्ञानी।  
<a id="line-6"></a>जेहि निर्लेप ब्रह्म कह ज्ञानी,  
<a id="line-7"></a>सोइ गोपिन विट ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी ज्ञानी।  
<a id="line-8"></a>जेहि आनंद ब्रह्म कह ज्ञानी,  
<a id="line-9"></a>सोइ रोवत ब्रज ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी ज्ञानी।  
<a id="line-10"></a>जेहि सर्वज्ञ ब्रह्म कह ज्ञानी,

<a id="line-11"></a>सोइ पढ़ क ख ग घ ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी ज्ञानी।  
<a id="line-12"></a>जेहि कह ब्रह्म निरंजन ज्ञानी,  
<a id="line-13"></a>अंजन गोपिन ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी ज्ञानी।  
<a id="line-14"></a>जेहि कह पूर्णकाम सब ज्ञानी,  
<a id="line-15"></a>सोइ कामी ब्रज ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी ज्ञानी।  
<a id="line-16"></a>जेहि अदृष्ट कहि गावत ज्ञानी,  
<a id="line-17"></a>तेहि ब्रज सब लख ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी ज्ञानी।  
<a id="line-18"></a>जेहि कह व्यापक बाँध्यो ज्ञानी,  
<a id="line-19"></a>यशुमति ऊखल ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी ज्ञानी।  
<a id="line-20"></a>जेहि कह जग चालक सोइ ज्ञानी,  
<a id="line-21"></a>सिखत चलन ब्रज ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी ज्ञानी।  
<a id="line-22"></a>अधकचरे “कृपालु” सब ज्ञानी,  
<a id="line-23"></a>अज्ञानी हैं ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी ज्ञानी॥

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-24"></a>भावार्थ— हे ज्ञानियों! तनिक ब्रज में आकर परम  
<a id="line-25"></a>आश्चर्य को देखो। हे ज्ञानियों! जिसे तुम अजन्मा कहते हो,  
<a id="line-26"></a>वह तो नन्द का पुत्र बना है। जिसे तुम अतनु ब्रह्म कहते हो,  
<a id="line-27"></a>उसने ब्रज में नरवपु धारण किया है। हे ज्ञानियों! जिस ब्रह्म को  
<a id="line-28"></a>तुम निर्लेप कहते हो, वह तो ब्रज में गोपियों का दास बना है।  
<a id="line-29"></a>जिसे तुम आनन्द ब्रह्म कहते हो, वह ब्रज में यशोदा की गोद में  
<a id="line-30"></a>जाने को रो रहा है। हे ज्ञानियों! जिसे तुम सर्वज्ञ ब्रह्म कहते हो,  
<a id="line-31"></a>वह उज्ज्ौन जाकर गुरु के निकट क, ख, ग पढ़ना सीख रहा है।  
<a id="line-32"></a>जिस ब्रह्म को तुम निरंजन कहते हो, वह गोपियों के नेत्रों का  
<a id="line-33"></a>अंजन बना है। जिसे सब ज्ञानीजन पूर्णकाम कहते हैं वह ब्रज

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-34"></a>में गोपियों के प्रति कामी बना है। ज्ञानी जिसे अदृष्ट कहते हैं  
<a id="line-35"></a>उसे तो ब्रज में सभी देख रहे हैं। जिसे ज्ञानी व्यापक कहते हैं,  
<a id="line-36"></a>उसे यशोदा ने ऊखल से बाँध दिया। जिसे सब ज्ञानी जगत् को  
<a id="line-37"></a>चलाने वाला कहते हैं, वह ब्रज में चलना सीख रहा है।“कृपालु”  
<a id="line-38"></a>कहते हैं- ये सब ज्ञानी अधूरे ज्ञानी हैं जिन्हें ब्रह्म के पूर्ण रूप  
<a id="line-39"></a>का ज्ञान नहीं है। ब्रह्म तो विरोधी गुणों से परिपूर्ण है अतः वह  
<a id="line-40"></a>तो ““अजायमानो बहुधा विजायते”” है। वह निराकार होते हुए  
<a id="line-41"></a>भी साकार है। वह आत्माराम होकर भी प्रेमियों के साथ विहार  
<a id="line-42"></a>करता है। ब्रह्म आनन्द रूप होकर भी सीता के वियोग में दुखी  
<a id="line-43"></a>होता है। वह सर्वज्ञ होकर भी पशु-पक्षियों से अपनी प्राण प्रिया  
<a id="line-44"></a>जानकी के विषय में जानना चाहता है-  
<a id="line-45"></a>“हे खग मृग , हे मधुकर स्रेनी। तुम देखी सीता मृगनैनी।”  
<a id="line-46"></a>ज्ञानियों के पूर्णकाम ब्रह्म ने रास विलास करने की इच्छा से  
<a id="line-47"></a>ब्रज में वंशी बजाकर ब्रजांगनाओं को अपने निकट बुलाया-  
<a id="line-48"></a>““भगवानपि ता रात्रिः-------””  
<a id="line-49"></a>ज्ञानियों का अदृष्ट ब्रह्म अपने भक्तों के नेत्रों का विषय बन  
<a id="line-50"></a>जाता है। ज्ञानियों का व्यापक ब्रह्म एकदेशीय बनकर प्रेम के  
<a id="line-51"></a>कारण ऊखल बन्धन की लीला का आयोजन करता है। प्रेम के  
<a id="line-52"></a>कारण ही जगत-चालक को यशोदा उँगली पकड़कर चलना  
<a id="line-53"></a>सिखाती है। वस्तुतः ज्ञान का फल प्रेम है। प्रेम के अभाव में  
<a id="line-54"></a>ज्ञान अपूर्ण है।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
