# भये मोहन सों नैना चार, अरी सुनु ओ सजनी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-1003-M21-K016
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 16
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 480–480

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>भये मोहन सों नैना चार, अरी सुनु ओ सजनी।  
<a id="line-2"></a>हौं जाति रही यमुना तट पै,  
<a id="line-3"></a>चट आय अचानक पनघट पै।  
<a id="line-4"></a>नैन बानन सों किय हरि वार, अरी सुनु ओ सजनी।  
<a id="line-5"></a>हौं घायल गिरी धरणि लखि त्यों,  
<a id="line-6"></a>उर बाण बिंधी हिरणी सखि! ज्यों।  
<a id="line-7"></a>कहि"हाय पिय! नन्दकुमार", अरी सुनु ओ सजनी।  
<a id="line-8"></a>मोहिं मुर्छित लखि सखि! सो छलिया,  
<a id="line-9"></a>बेदर्दी मृदु मुसकाय पिया।  
<a id="line-10"></a>तान छेड़ी मुरलि रिझवार, अरी सुनु ओ सजनी।  
<a id="line-11"></a>सुनि तान गई मुरछा तन की,  
<a id="line-12"></a>परस्यो तन जान कान्ह मन की।  
<a id="line-13"></a>को बरने “कृपालु” सुख यार, अरी सुनु ओ सजनी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर से मेरी आँखें चार हो गयी हैं। अरी ओ सखि! सुन ले। मैं यमुना के किनारे जा रही थी, वहीं पर श्यामसुन्दर अचानक आ गये। अरी सखि! सुन, उन्होंने अपनी आँखों के कटाक्षपात से प्रहार कर दिया। मैं घायल हो कर पृथ्वी पर उसी प्रकार गिर पड़ी जिस प्रकार किसी हिरणी के हृदय में बाण बिंध जाने से वह गिर पड़ती है। अरी सखि! सुन, मैं 'हा प्रियतम नन्दकुमार 'ऐसा कहकर मूर्च्छित हो गिर पड़ी। अरी सखि! तत्पश्चात् मुझे मूर्च्छित देखकर उस निष्ठुर छलिया प्रियतम ने मन्द-मन्द मुस्करा दिया और अरी सखि! सुन, फिर उसने मधुर मुरली को तान छेड़ दी। मुरली की तान सुनते ही मेरी मूर्च्छां समाप्त हो गयी। उसी समय मेरे मन के भाव को समझकर श्यामसुन्दर ने मुझे उठा लिया। अरी सखि! सुन, उस समय जो प्रियतम के स्पर्श का मधुर सुख मिला, 'कृपालु' कहते हैं कि उसका वर्णन नहीं हो सकता अथवा प्रियतम के इस अन्तरंग रस को मैं नहीं कहना चाहती।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 929,928

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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