# बलभ्रात सतावै दिन रात री, मात! री सुनु बात री।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-1000-M21-K013
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रकीर्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 13
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 477–478

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>बलभ्रात सतावै दिन रात री, मात! री सुनु बात री।  
<a id="line-2"></a>फोरत घट नटखट पनघट पै,  
<a id="line-3"></a>तोरत लर, चोरत पट तट पै,  
<a id="line-4"></a>मटकावत भौं न लजात री, मात! री सुनु बात री।  
<a id="line-5"></a>कर दृग-सैनन रस-रंग-सने,  
<a id="line-6"></a>अड़बंग ढंग मुख बैन भने,  
<a id="line-7"></a>कछु बोलूँ तो मृदु मुसकात री, मात! री सुनु बात री।  
<a id="line-8"></a>हरि कह झूठेहिं ये धरति नाम,  
<a id="line-9"></a>सूधो है केतिक तेरो श्याम,  
<a id="line-10"></a>सब चाहति मोहिं पिय नात री, मात! री सुनु बात री।  
<a id="line-11"></a>भोरी मैया सुनि मानि गई,  
<a id="line-12"></a>ब्रज-बालनि डाँटि भजाय दई,  
<a id="line-13"></a>लिय लाय “कृपालु” उर मात री, मात! री सुनु बात री॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखी मैया यशोदा से कहती है-अरी मैया! जरा मेरी बात तो सुन ले। तेरा कन्हैया अकारण ही दुःख देता है। पनघट पर हमारा घड़ा फोड़ देता है। कभी लड़ तोड़ देता है। कभी यमुना तट से हमारे वस्त्र चुरा लेता है और मैया यह निर्लज्ज लंपट की भाँति भौंह मटकाता है। इतना ही नहीं, आँखों से रसीले कटाक्षपात करता है एवं मुख से अटपटी बात बोलता है और जब मैं कुछ डाँटती हूँ तो मन्द-मन्द मुस्करा देता है। श्यामसुन्दर ने कहा-अरी मैया! यह सब गोपियाँ मेरा झूठा ही नाम लगा रही हैं। तू तो जानती ही है तेरा कन्हैया कितना सीधा है। मैया! सच तो यह है कि यह सब मुझसे प्रियतम का नाता जोड़ना चाहती हैं। भोली-भाली मैया कन्हैया की बात सुनकर मान गई और गोपियों को डाँट कर भगा दिया। 'कृपालु' कहते हैं कि मैया ने लाला को हृदय से लगा लिया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 933,932,931

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
