# सरस-सुरति-रस सरस सो रति रस, बरसत वृन्दा विपिन मझार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0987-M20-K022
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: रसिया-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 22
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 464–466

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सरस-सुरति-रस सरस सो रति रस, बरसत वृन्दा विपिन मझार।  
<a id="line-2"></a>मनिमय-धरनि तरनि-तनया-तट।  
<a id="line-3"></a>सुखद-शरद-निशि-शशि वंशी-वट।  
<a id="line-4"></a>गहि रस-रीति प्रीति अति अटपट।  
<a id="line-5"></a>रिझवत निज-आराध्य राधिकहिं, परम-रसिक-रिझवार।  
<a id="line-6"></a>लखि उत्फुल्ल-मल्लिका-शोभा।  
<a id="line-7"></a>पूरण-काम श्याम मन लोभा।  
<a id="line-8"></a>उपजी रास-वासना-गोभा।  
<a id="line-9"></a>साजि साज-ऋतुराज आज तहँ, आयो जूझन मार।  
<a id="line-10"></a>राम-कृपा दण्डक-वन-वासिन।  
<a id="line-11"></a>ह्लादिनि-शक्ति जानकी-दासिन।  
<a id="line-12"></a>वेद-ऋचान रास-अभिलाषिन।  
<a id="line-13"></a>अपर सखिन गोलोक-निवासिनि, बनि आई ब्रजनार।  
<a id="line-14"></a>मधुर-मुरलि-धुनि सुनि अभिरामिनि।  
<a id="line-15"></a>उठि धाई सिगरी ब्रजभामिनि।  
<a id="line-16"></a>श्याम-गौर बिच जनु घन-दामिनि।  
<a id="line-17"></a>प्रति-गोपिन-सँग श्याम सुशोभित, लिये अमित-तनु धार।  
<a id="line-18"></a>गावत विविध-राग लै तानन।  
<a id="line-19"></a>"स रे ग म प ध नी", सुरन संधानन।  
<a id="line-20"></a>देव वधूटिन लखति विमानन।  
<a id="line-21"></a>बाजत झाँझ, मृदंग, चंग, ढप, सबै सुरन इकसार।  
<a id="line-22"></a>लटकि-लटकि कटि-तट लचकावति।  
<a id="line-23"></a>पटकि-पटकि झटपट पग धावति।  
<a id="line-24"></a>मटकि-मटकि तट-भृकुटि नचावति।  
<a id="line-25"></a>हस्तक-मस्तक भेद दिखावति, सखियन, यूथ अपार।  
<a id="line-26"></a>प्रेमावेश केश, पट, भूषन।  
<a id="line-27"></a>स्त्रस्त व्यस्त रतिरस-पीयूषन।  
<a id="line-28"></a>दिव्य-विलास करत जित-दूषन।  
<a id="line-29"></a>चरनन-नूपुर, करकंकन, कटि, किंकिनि-धुनि-झनकार।  
<a id="line-30"></a>कोक-कलानि प्रवीन-सुभायन।  
<a id="line-31"></a>रास-विलास-लास मन-भायन।  
<a id="line-32"></a>विविध हास-परिहास-परायन।  
<a id="line-33"></a>खेलत निज-प्रतिबिंब सखिन सँग, लघु बालक अनुहार।  
<a id="line-34"></a>खग, मृगादि, जंगम गति भूले।  
<a id="line-35"></a>जड़हुँ भये चेतन चित-फूले।  
<a id="line-36"></a>झूलत सबै प्रेम-रस-झूले।  
<a id="line-37"></a>ह्वै रस-बस बरबस शशि मोह्यो, मारहु मानी हार।  
<a id="line-38"></a>धनि निकुंज, धनि श्री वृंदावन।  
<a id="line-39"></a>धनि-धनि रसिक रवनि गोपी जन।  
<a id="line-40"></a>धनि रासेश्वरि स्वामिनि-मोहन।  
<a id="line-41"></a>धनि “कृपालु” गोपी दासिन जिन, निरखत रास विहार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

वृन्दावन में सुरति-रस (ज्ञानियों की निर्विकल्प समाधि के आनन्द से भी अत्यन्त मधुर रति-रस, प्रेम का अन्तरंग रास-विहार रस) बरस रहा है। वंशीवट पर यमुना के किनारे जहाँ की पृथ्वी दिव्य चिन्मय मणियों से जटित है एवं अत्यन्त ही आनन्द देने वाला शरद्पूर्णिमा का चंद्रमा खिला हुआ है, रसिकों की अत्यन्त ही अटपटी प्रीति की रीति के अनुसार, रसिक शिरोमणि ब्रह्म श्रीकृष्ण अपनी आराध्या स्वामिनी राधिकाजी को प्रसन्न कर रहे हैं। जब श्रीकृष्ण ने देखा कि शरद्काल में भी बसंतकालीन मल्लिका आदि पुष्प खिले हुए हैं, तब आत्माराम, पूर्णकाम श्रीकृष्ण का भी मन मुग्ध हो गया एवं महारास की इच्छा करने का अंकुर उत्पन्न हुआ। श्रीकृष्ण ने समझ लिया कि आज कामदेव बसंत-ऋतु के साज को सजाकर मुझसे युद्ध करने आया है। दण्डकारण्य के मुनियों ने रामावतार में राम के द्वारा वरदान पाकर, ह्लादिनी-शक्ति सीता की दासियों ने जनकपुर में वरदान पाकर तथा वेद की ऋचाओं ने भी घोर तपस्या करके वरदान पाकर, एकमात्र महारास की इच्छा से, साधन-सिद्धा रूप में ब्रज में आ-आकर गोपियों का शरीर धारण किया। इसके अतिरिक्त नित्यसिद्धा गोलोक में रहने वाली गोपियों ने भी अवतार लिया। मनमोहन विश्वविमोहिनी मुरली की मधुर तान सुनकर समस्त ब्रज-गोपियाँ दौड़कर श्यामसुन्दर के पास आ गई एवं रासमंडल बना लिया। रास-मंडल के मध्य में राधाकृष्ण बिजली एवं बादल की तरह सुशोभित हुए। श्रीकृष्ण ने अघटित घटना-पटीयसी योगमाया के द्वारा प्रत्येक गोपी के साथ अपना एक-एक स्वरूप धारण कर लिया। इस प्रकार दो गोपियों के बीच में एक श्रीकृष्ण एवं दो श्रीकृष्ण के बीच में एक गोपी। मल्हार आदि विविध रागों को सरे ग म प ध नि इन सात स्वरों में बाँधकर अनेकानेक तान आलाप द्वारा गायन आरम्भ किया। इस रस को देवांगनाएँ अपने-अपने विमानों में बैठकर देख रही हैं। गायन के स्वर के अनुसार ही झाँझ, मृदंग, चंग, ढप आदि वाद्यों का सुर मिलाकर वादन होने लगा। पाँच अंगों से प्रमुख नृत्य, सखियों का झुण्ड झुक-झुककर बार-बार कमर लचका रहा है। पैरों के ठुमके लगा-लगाकर घूमता हुआ मंडल आगे को बढ़ता हुआ जा रहा है। मंडल प्रेम में विभोर होकर भौंहों को नचाते हुए कटाक्षपात कर रहा है एवं हाथ के तथा मस्तक के नृत्य-सम्बन्धी सांकेतिक हाव-भाव दिखा रहा है। इस प्रकार प्रेम के आवेश के कारण नृत्य करते-करते प्रेमामृत-रस-माधुरी में उन्मत्त गोपियों के वस्त्र, गहने एवं सिर के बाल शिथिल होकर इधर-उधर बिखर गये हैं। दोषरहित दिव्य विलास करते हुए गोपियों के पैरों में नूपुर, हाथ के कंकण एवं कमर में करधनी की मधुर ध्वनि हो रही है। प्रेम की अन्तरंग कलाओं में निपुणतम-रसिकशिरोमणि श्रीकृष्ण अनेक प्रकार के दिव्य हास एवं परिहास से युक्त होकर दिव्य रास-विलास करते हुए गोपियों के साथ उसी प्रकार खेल रहे हैं, जिस प्रकार छोटा सा अबोध बालक अपनी परछाई से खेलता है। इस अलौकिक रासविहार को देखकर जंगम जीव हिरण, पक्षी आदि निर्निमेष दृष्टि से देखते हुए अपना चलना भूल गये अर्थात् पत्थर की मूर्ति की तरह एकटक देखते ही रह गये तथा जड़ जीव पत्थर आदि पिघल-पिघलकर बहने लगे। इस प्रकार आनन्द में विभोर होकर सभी प्रेमरस में उन्मत्त होकर झूमने लगे। चन्द्रमा भी इस महारास माधुरी को देखकर हठात् मुग्ध हो गया एवं बिना युद्ध किये ही कामदेव भी पराजित होकर विशुद्ध प्रेम में विभोर हो गया। वह सेवाकुंज एवं श्रीवृन्दावन-धाम धन्य है। रसिक-शिरोमणि गोपियाँ भी धन्य हैं एवं रास की स्वामिनी किशोरी जी तथा श्रीकृष्ण भी धन्य हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि उन सखियों के अनुगत वे महापुरुष भी धन्य हैं जो युगल सरकार की कृपा से निरन्तर ही उपर्युक्त रास-विहार को देखते रहते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 915-918,949

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
