# लखि रस-बरसानो बरसानो, कोटिन ब्रह्मानंद लजाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0981-M20-K016
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: रसिया-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 16
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 460–461

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लखि रस-बरसानो बरसानो, कोटिन ब्रह्मानंद लजाय।  
<a id="line-2"></a>महाभावरूपिणि श्री राधे।  
<a id="line-3"></a>प्रेम-सुधा-निधि, रूप-अगाधे।  
<a id="line-4"></a>पूरण-ब्रह्म जाहि आराधे।  
<a id="line-5"></a>श्रीवृषभानुभूप घर प्रकटीं, प्रेम-दान हित आय।  
<a id="line-6"></a>जेहि,"अज अलख"निगम नित गायो।  
<a id="line-7"></a>सो ब्रज, नंद-गोप घर जायो।  
<a id="line-8"></a>जेहि विधि, हरि हर खोजि न पायो।  
<a id="line-9"></a>सोऊ ब्रह्म, स्वामिनिहिं खोजत, गहवर गलियन माय।  
<a id="line-10"></a>पीरी-पोखर, प्रेम-सरोवर।  
<a id="line-11"></a>लता-कुंज-गहवर, भानूखर।  
<a id="line-12"></a>मालिनि, योगिनि रूप विविध धर।  
<a id="line-13"></a>ब्रह्म रिझावत, निज स्वामिनि को, उर आनँद न समाय।  
<a id="line-14"></a>"हा हा"खात, निहोरत सखियन।  
<a id="line-15"></a>नेकु दिखाउ ललिहिं इन अँखियन।  
<a id="line-16"></a>मधु पिलावु छवि दृग मधु-मखियन।  
<a id="line-17"></a>ललितहिं चरण पलोटत लखि लखि, लाल नैन ललचाय।  
<a id="line-18"></a>राधा-रंग महल के माहीं।  
<a id="line-19"></a>रज झारत निज मुकुट सदा हीं।  
<a id="line-20"></a>कृपा मनावतहूँ डरपाहीं।  
<a id="line-21"></a>नित “कृपालु” मानिनिहिं मनावत, ब्रह्म दृगन झरि लाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

प्रेम-रस रसाने वाले बरसाना धाम को देखकर करोड़ों ब्रह्मानंद के सुख भी फीके पड़ सकते हैं। प्रेम की परमसार-तत्त्व महाभावस्वरूपा एवं प्रेमामृत की उद्गम स्थान श्रीवृषभानुनन्दिनी श्री राधिका हैं। जिनकी पूर्णतम पुरुषोत्तम-ब्रह्म श्रीकृष्ण भी उपासना करते हैं। वे ही राधिका जी बरसाने में श्रीवृषभानु राजा के घर में अधिकारियों को प्रेमदान करने के लिए अवतीर्ण हुई हैं। ब्रह्म को वेदों में अजन्मा एवं अलख बताया है, वही ब्रह्म ब्रज में अहीर नन्द के घर में श्रीकृष्ण रूप में प्रकट हुआ है। जिस सगुण साकार ब्रह्म को ब्रह्मा, विष्णु, शंकर भी तपश्चर्या आदि साधनों के बल पर नहीं प्राप्त कर सके, वही ब्रह्म श्रीकृष्ण आज अपनी स्वामिनी राधिकाजी को पाने के लिए अत्यन्त आतुर होकर बरसाने के गह्वरवन की गलियों में ढूँढ रहा है। उस बरसाने में पीरी-पोखर, प्रेम-सरोवर, वृषभानु-कुण्ड एवं गह्वरवन की लताएं कुंज आदि अनुपम स्थान हैं। जहाँ ब्रह्म श्रीकृष्ण मालिनी, योगिनी आदि विविध रूप धारण करके एवं आनंद-विभोर होकर नित्य ही अपनी स्वामिनी राधिका जी को प्रसन्न करते हैं। जिस बरसाने में ब्रह्म श्रीकृष्ण अपनी स्वामिनी के दर्शनार्थ उनकी सखियों का'निहोरा करते हैं एवं हा हा खाते हुए कहते हैं, 'अरी सखियों। इन आँखों को स्वामिनी जी के दर्शन करा दो, मेरी आँखें किशोरी जी के छवि रूपी मधु के लिए मधु मक्खियों के समान हैं।'वे ही ब्रह्म श्रीकृष्ण ललिता को किशोरी जी के चरणों को दबाते हुए देखकर ललचाते हैं। राधिकाजी के रंगमहलों में जाकर वे ही ब्रह्म श्रीकृष्ण अपने मुकुट से सदा ही महल की धूल साफ करते हैं एवं उनकी कृपा माँगने में भी भयभीत होते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि मानिनी राधिका जी को मनाते हुए वे ही ब्रह्म श्रीकृष्ण अपनी आँखों से आँसुओं की झड़ी लगाते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 906-908

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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