# छवि निधि रस निधि प्रेम-सुधा-निधि, राधे श्रीवृषभानु दुलार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0970-M20-K005
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: रसिया-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 5
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 450–452

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>छवि निधि रस निधि प्रेम-सुधा-निधि, राधे श्रीवृषभानु दुलार।  
<a id="line-2"></a>ह्लादिनि-शक्ति परम सुख खानी।  
<a id="line-3"></a>ताको सारहिं प्रेम बखानी।  
<a id="line-4"></a>प्रेम-सार राधा ठकुरानी।  
<a id="line-5"></a>महाभाव रूपिणि जु नवेली, अलबेली सरकार।  
<a id="line-6"></a>मणिमय कनक-मुकुट सिर सोहै।  
<a id="line-7"></a>चारु-चंद्रिका छवि मन मोहै।  
<a id="line-8"></a>तापर लर वर मुक्त न को है।  
<a id="line-9"></a>कारी, अनियारी, घुँघरारी, वेणी कुसुम-सँवार।  
<a id="line-10"></a>श्रुति-ताटंक मकर-मन-हारी।  
<a id="line-11"></a>लजत काम-धनु लखि भौं-प्यारी।  
<a id="line-12"></a>सुधा-गरल-मधुमय दृग वारी।  
<a id="line-13"></a>खंजन-मृग-चकोर-मद-गंजन, अंजन मन-रिझवार।  
<a id="line-14"></a>झलमलात मुक्ताहल नासा।  
<a id="line-15"></a>वदन-विकास मंजु-मधु-हासा।  
<a id="line-16"></a>वदन-सदन विधु-रदनन वासा।  
<a id="line-17"></a>कर चूरी-करपत्र, मूँदरिन, अँगुरिन सुघर सँवार।  
<a id="line-18"></a>कंचुकि उर विलसति नव रंगी।  
<a id="line-19"></a>हार-मणिन-मोतिन बहुरंगी।  
<a id="line-20"></a>त्रिवलि-नाभि-सर कटि-तन्वंगी।  
<a id="line-21"></a>पृथु-नितम्ब, परिधान-नीलपट, चूनरि जरिन-किनार।  
<a id="line-22"></a>रतन-जटित पग-पायल सोहिनि।  
<a id="line-23"></a>चाल मरालन को मन मोहिनि।  
<a id="line-24"></a>लखि लाजत शत-रति-पति-रोहिनि।  
<a id="line-25"></a>आयो देखि “कृपालु” दीन को, आदर येहि दरबार।

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्रीवृषभानुनन्दिनी राधिकाजी रूप रस एवं प्रेमसुधा की निधि-स्वरूपा हैं। ह्रादिनी-शक्ति (आनन्द-ब्रह्म की सारभूता शक्ति) परमसुख की खान हैं। उस ह्रादिनी शक्ति के ही सार को महापुरुषों ने प्रेम कहा है एवं उसी प्रेम की सारभूता शक्ति ठकुरानी राधिका हैं। उनको महाभाव स्वरूपिणी भी कहते हैं। श्रीराधिकाजी के सिर पर मणियों से जटित स्वर्ण का मुकुट सुशोभित हो रहा है एवं मनोहर चन्द्रिका बरबस मन को मोहित करने वाली है। उस चन्द्रिका के ऊपर मोतियों की लड़ें क्या ही शोभा देती हैं। फूलों से सजाई हुई वेणी के बाल अत्यन्त ही काले, घने एवं घुँघराले हैं। कानों में मकर के मन को भी मोहित करने वाले मनोहर झुमके झूम रहे हैं एवं उनकी प्यारी भौंहों को देखकर कामदेव का धनुष भी लज्जित हो रहा है। उनकी आँखें अमृत, विष, एवं मदिरा के गुणों से युक्त हैं एवं अंजन से युक्त वे आँखें खंजन, हिरन तथा चकोर के अभिमान को भी चूर्ण करने वाली हैं तथा रसिकों को आनन्द देने वाली हैं। उनकी नासिका पर झलमलाता हुआ मुक्ताहल सुशोभित हो रहा है। उनके सुन्दर मुख की शोभा मंद मधुर मुस्कान से और भी बढ़ गई है। उनके मुख रूपी गृह में मानो दाँत रूपी अनेक चन्द्रमा निवास करते हैं। उनके हाथों में चूड़ी, कर पत्र (पतरा) एवं अँगुलियों में मनोहर अँगूठियाँ शोभा दे रहीं हैं। उनके वक्षस्थल पर अति सुन्दर रंग की चोली अलंकृत है। गले में विविध प्रकार के रंगवाले मणियों एवं मोतियों के हार सुशोभित हो रहे हैं। गहरे तालाब की तरह नाभि है एवं पेट में तीन वलियाँ पड़ी हुई हैं। कमर पतली है, कमर का निचला भाग मोटा है, नीलाम्बर पहिने हुए हैं। उनकी चुनरी में जरी के काम की किनारी लगी हुई है। उनके पैरों में अनेक प्रकार के रत्नों से जटित पायल शोभा दे रही है। इनकी चाल राजहंसों के मन को मोहित करने वाली है तथा जिसको देखकर सैकड़ों कामदेव एवं चन्द्रमा लज्जित हो रहे हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि ऐसी रूप-शृंगार रस-सुधा-माधुरी वृषभानुनन्दिनी के दरबार में शरणागत दीनों का सदा ही आदर होता है, ऐसा मैं अनुभव कर के आया हूँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 889-891

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
