# सखी! मोहिं, चन्द्रकिरन तड़पाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0934-M19-K183
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 183
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 433–433

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! मोहिं, चन्द्रकिरन तड़पाय।  
<a id="line-2"></a>शशि अकाश बस, वास भूमि मम, तासों कछु न बसाय।  
<a id="line-3"></a>हरि अवतरि, खल बधत, तजत पै, सुत मानस मनभाय।  
<a id="line-4"></a>कहु चकोर ते करि अगस्त्य गुरु, इन किरनन पी जाय।  
<a id="line-5"></a>राहु-केतु जुरवाय जरा कहि, पुनि सो खाय पचाय।  
<a id="line-6"></a>यह “कृपालु” खल-रीति पुरातन, जरे लोन भुरकाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

( एक विरहिणी चन्द्रमा को कोसती हुई अपनी अन्तरंग सखी से कहती है।) अरी सखी! मुझे चन्द्रमा की किरणें अत्यन्त ही कष्ट देती हैं। क्या करूँ? मेरा कुछ वश नहीं है, क्योंकि मैं पृथ्वी पर रहती हूँ एवं चन्द्रमा आकाश में रहता है। अरी सखी! भगवान् दुष्टों को मारने के लिए अवतार लिया करते हैं, किन्तु इसे कदाचित् अपना मानसपुत्र समझकर छोड़ देते हैं (वेदों में बताया गया है कि चन्द्रमा भगवान् के मन से उत्पन्न होता है एवं सूर्य नेत्रों से)। अरी सखी! मेरा कुछ वश नहीं है। भगवान् का पुत्र समझकर इसे नहीं मारते हैं तो ऐसी दशा में एक काम कर कि चकोर पक्षी के पास जाकर उससे कह कि चह अगस्त्यमुनि के पास जाकर उनसे दीक्षा लेकर पान करने की विद्या सीख ले तथा इस चन्द्रमा की समस्त किरणों को पी जाय (आगस्त्य मुनि ने एक बार सारा समुद्र पी डाला था) फिर झगड़ा ही समाप्त हो जाय (थोड़ी देर सोचकर) किन्तु वह पक्षी है, मनुष्य की बात कैसे समझेगा। अरी सखी! तू ऐसा कर कि तू जरा नाम की राक्षसी के पास चली जा एवं। उससे कह कि वह राहु (बिना धड़ का) एवं केतु (बिना सिर का) को फिर से जोड़ दे ताकि चन्द्रग्रहण के समय राहु चन्द्रमा को खाकर पेट में ही सदा के लिए पचा डाले। (जरा नाम की राक्षसी ने ही शरीर के मध्य भाग से चीरे हुए एक विधवा के पुत्र को जोड़कर जरासन्ध नामक महान् दैत्य बना दिया था)। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखी! दुष्टों का सदा से यह स्वभाव चला आया है कि वह दुःखी जीवों को और भी दुःखी करते रहते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 854-855

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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