# पथिक तुम, इतनो कहियो जाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0865-M19-K114
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 114
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 404–404

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>पथिक तुम, इतनो कहियो जाय।  
<a id="line-2"></a>अब न कबहुँ कछु कहहुँ लाल सों, एक बार आ जाय।  
<a id="line-3"></a>ऊखल माहिं न कबहुँ बाँधिहौं, कितै उरहनो आय।  
<a id="line-4"></a>माखन-चोरी ते न रोकिहौं, करे जोइ मनभाय।  
<a id="line-5"></a>जो कोउ ब्रज में कान्हहिं छेड़े, वाको दऊँ बँधाय।  
<a id="line-6"></a>मोको माय न माने तबहूँ, नातो माने धाय।  
<a id="line-7"></a>इमि “कृपालु” कहि यशुमति विलपति, दृग अँसुवन झरि लाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(यशोदा जी अपने लाला के वियोग में एक पथिक से श्रीकृष्ण के लिए संदेश भेजती हैं।) यशोदा जी कहती हैं कि हे राहगीर! तुम मेरे लाला से इतनी ही कह देना कि वह एक बार आकर और देख जाय। यदि उसे कोई कष्ट हो तो फिर चला जाय। मैं अब अपने लाला से कभी कुछ नहीं कहूँगी एवं गोपियों के कितने ही उलाहने क्यों आयें मैं अपने लाला को भी कभी भी ऊखल में नहीं बाँधूंगी। मक्खन चुराने से भी मैं अब कभी नहीं रोकूँगी। उसकी जो इच्छा हो वही करे। जो कोई ब्रज में मेरे कन्हैया को छेड़ेगा उसे बँधा दूँगी। हे पथिक! मेरे लाला से कहना कि यदि वह मेरे पास मैया के नाते न आ सके तो भी कम-से-कम पालने वाली धाय के ही नाते आ जाय। 'कृपालु' कहते हैं कि यशोदा जी पथिक से अपने लाला के लिए इस प्रकार सन्देश कहती हुई आँखों से आँसुओं की झड़ी लगाकर विविध प्रकार से विलाप करने लगीं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 801-802

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
