# गये हम, इन नैनन ते हार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0845-M19-K094
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 94
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 394–394

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>गये हम, इन नैनन ते हार।  
<a id="line-2"></a>प्रथम न माने, अति मनमाने, अरुझाने दृग चार।  
<a id="line-3"></a>गये हार जब रोदन ठाने, मो गर फाँसी डार।  
<a id="line-4"></a>जो कछु करयो, भर्यो सो अबहूँ, सोचत नाहिं गमार।  
<a id="line-5"></a>लंपट भ्रमर सरस-रस-लोभी, विहरत कुसुम अपार।  
<a id="line-6"></a>इमि जिय जानि ध्यान तजि उनको, सोइय पाँव पसार।  
<a id="line-7"></a>किमि “कृपालु” सोइय जिन नैनन, करकत नंदकुमार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है कि प्यारे श्यामसुन्दर के हेतु दीवाने इन नेत्रों से मैं तो हार गयी। पहले तो यह मनमाने आ कर मेरी बात न मानते हुए प्रियतम की आँखों में जाकर उलझ गये और अब जब हार गये तो मेरे गले में फाँसी डालकर स्वयं आँसू बहा रहे हैं। इन नेत्रों ने जो कुछ भी मनमाना किया उस का फल भली-भाँति पा लिया किन्तु यह इतने हठीले और मूर्ख हैं कि अब भी किंचित् भी विचार नहीं करते। जिस प्रकार मधुर रस का लोलुप भौंरा लम्पट की भाँति अनन्तानन्त पुष्पों का चक्कर लगाया करता है उसी प्रकार श्यामसुन्दर भी हैं। ऐसा समझ कर नेत्रों! अब भी उनका ध्यान छोड़ दो एवं चैन से सोओ। 'कृपालु' कहते हैं कि जिन नेत्रों में निरन्तर नन्दकुमार करकते रहते हैं वे नेत्र भला किस प्रकार चैन से सो सकते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 784-785

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
