# ऊधो!, हरि सों कहियो जाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0821-M19-K070
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 70
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 383–383

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, हरि सों कहियो जाय।  
<a id="line-2"></a>मग जोहत जिमि तृषित चातकिन, घन-श्यामहिं दृग लाय।  
<a id="line-3"></a>तिमि प्रेमामृत-तृषित सखिन नित, घनश्यामहिं अकुलाय।  
<a id="line-4"></a>पै जो उनहिं मधुपुरिहिं भावे, जनि पावें दुख आय।  
<a id="line-5"></a>हम सब उनहिं सुखी देखन चह, तिन सुख सुखी सदाय।  
<a id="line-6"></a>इमि “कृपालु” कहि सखिन मौन भई, ऊधो दृग बरसाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्रीकृष्ण-वियोगिनी नित्यसिद्ध गोपियाँ संदेशवाहक उद्धव से कहती हैं कि उद्धव! तुम हमारे प्यारे श्यामसुन्दर से जाकर कहना कि जिस प्रकार जल की प्यासी चातकियाँ स्वाती के काले बादलों की टकटकी लगाये प्रतीक्षा करती रहती हैं उसी प्रकार प्रेमामृत की प्यासी ब्रजगोपियाँ भी प्यारे श्यामसुन्दर की प्रतीक्षा में अत्यन्त ही व्याकुल रहती हैं। फिर भी उनसे कह देना कि यदि उन्हें मथुरा नगरी ही अच्छी लगती है तथा उन्हें यहाँ आने में कष्ट होता है, तो हम हृदय से कहती हैं कि वे यहाँ आकर दुःखी न हों। हम सब ब्रजगोपियाँ उन्हें सदा ही सुखी देखना चाहती हैं। उन्हीं के सुख में हम अपना सुख समझती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इस प्रकार हृदय को विदीर्ण कर देने वाली बातों को कहकर गोपियाँ चुप हो गईं एवं उद्धव उनको इस निष्कामता को देखकर प्रेम विभोर हो गये तथा आँखों से आँसू बहाने लगे।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 764-765

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
