# ऊधो!, भली करी तुम आये।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0803-M19-K052
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 52
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 376–376

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, भली करी तुम आये।  
<a id="line-2"></a>यह ब्रज इक जादू की नगरी, ज्ञानिहुँ ज्ञान गमाये।  
<a id="line-3"></a>श्रीयुत करन परमहंसन कहँ, यह ब्रज हरि प्रकटाये।  
<a id="line-4"></a>नीरस ज्ञान सरस करिवे को, माधव तोहिं पठाये।  
<a id="line-5"></a>योगीराज शंभु सनकादिक, जे आये बौराये।  
<a id="line-6"></a>वचन “कृपालु” गूढ़ सुनि ऊधो, बूड़े थाह न पाये॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

( श्रीकृष्ण वियोगिनी नित्यसिद्वा-गोपियाँ उद्धव से कहती हैं।) हे उद्धव! तुमने बड़ा ही अच्छा किया जो यहाँ आ गये। यह ब्रज जादू की एक विचित्र नगरी है, जिसमें बड़े-बड़े ज्ञानियों का भी ज्ञान समाप्त हो जाता है। वास्तव में तो इस नगरी का ब पर ही विशेष रूप से प्रभाव डालता है। आत्माराम पूर्णकाम, योगीन्द्र, अमलात्मा परमहँस को ही श्रीयुत करने के लिए, अर्थात् श्री परमहँस बजाने के लिए पूर्णतम-पुरुषोत्तम ब्रह्म-श्रीकृष्ण ने मर्त्यलोक में यह अपना गोलोक-रूपी ब्रज प्रकट किया है। हे उद्धव! प्यारे श्यामसुन्दर ने तुम्हारे प्रेमरस शून्य नीरस ज्ञान को ही सरस करने के लिए तुम्हें हम लोगों के पास भेजा है। ज्ञानियों के सम्राट योगीराज भगवान् शकंर एवं नित्य-जीवन-मुक्त परमहँस सनकादिक जो भी इस ब्रज में आये, सब के सब प्यारे श्यामसुन्दर के प्रेम में दीवाने हो गये। कृपालु' कहते हैं कि गोपियों के इन रहस्य भरे मार्मिक वचनों को सुनकर उद्धव प्रेमरसामृत सिन्धु में इतने डूब गये कि फिर ऊपर न आ सके। अर्थात् ब्रजदेवियों की कृपा से उद्धव को वह अलौकिक प्रेम प्राप्त हो गया एवं वे उसमें निमग्न होकर कृतार्थ हो गये।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 750-751

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
