# या कारे ने, करे करतब कारे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0736-M18-K015
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: होरी-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 15
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 346–346

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>या कारे ने, करे करतब कारे।  
<a id="line-2"></a>सुनु गोरी होरी खेलन मिस, हाय! करोर जुलुम ढारे।  
<a id="line-3"></a>मलत गुलाल गाल कहि""प्यारी"", मोहूँ कह"तू कह प्यारे"।  
<a id="line-4"></a>बरबस नैनन नैन मिलावत, पुनि तकि-तकि सैनन मारे।  
<a id="line-5"></a>कहत लजात बात औरन सखि, करत न का, रे दैया रे।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” तू तो अबला सखि! याते विधि, हरि, हर हारे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

होली के दिनों में श्यामसुन्दर के अटपट व्यवहारों से तंग आकर प्यार भरे कटाक्ष में एक सखी कहती है-' अरी सखी! इस काले कन्हैया की सब करतूतें भी काली हैं। अरी सखी! सुन, यह होली खेलने के बहाने करोड़ों जुल्म की बात करता है। '"प्यारी''कह कर गाल में गुलाल लगाता है और फिर मुझसे भी कहता है कि तू शर्माती क्यों है? मुझे 'प्यारे क्यों'नहीं कहती? अरी सखी! जबर्दस्ती झुककर आँख से आँख मिलाता है एवं अनेक प्रकार के अटपटे इशारे करता है। अरी सखी! और अन्तरंग बातों को बताने में लज्जा आती है संक्षेप में तू इतना समझ ले कि वह क्या नहीं करता।''इतने में ही 'कृपालु' ने कहा ''अरी सखि! तू तो लोकवेद में अबला मानी गई है, इससे तो महान् बलवान् ब्रह्मा, विष्णु, शंकर भी हार चुके हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 693-694

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
