# मानिनी! बात मान तजु मान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0696-M16-K043
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 43
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 327–327

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मानिनी! बात मान तजु मान।  
<a id="line-2"></a>प्रियतम प्राण जात उत तू इत, ठानति मान गुमान।  
<a id="line-3"></a>तुम बिनु उत उन्माद भयो उन, तू इत करति न कान।  
<a id="line-4"></a>"हा राधे!"कहि पुनि पुनि टेरत, मंजुल कुंज-लतान।  
<a id="line-5"></a>गिरत धरनि विलखाय छिनहिं छिन, मनहुँ चले अब प्रान।  
<a id="line-6"></a>अति की बात “कृपालु” न कतहूँ, नीकी यह जिय जान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(ललिता सखी मानिनी किशोरी जी को मनाती हुई कहती हैं।) हे किशोरी जी! अब तुम हमारी बात मान लो एवं मान छोड़ दो। हे किशोरी जी! तुम इधर मान किये बैठी हो, उधर प्रियतम के प्राण जा रहे हैं। तुम इधर तो मेरी बात तक नहीं सुनती, उधर तुम्हारे बिना प्रियतम को उन्माद रोग हो गया है। सुन्दर कुंजलताओं में प्रियतम अत्यन्त अधीर होकर, 'हा राधे! हा राधे!!'कह-कहकर तुम्हें पुकार रहे हैं। एवं बार-बार मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो उनके प्राण अब निकलना.ही चाहते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि हे किशोरी जी! तुम विश्वास करो, इस लोक में भी लोग कहते हैं कि किसी भी बात की अतिशयता बहुत बुरी होती है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 657-658

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
