# कुँवरि बिनु, प्रियतम होत अधीर।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0685-M16-K032
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 32
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 322–322

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कुँवरि बिनु, प्रियतम होत अधीर।  
<a id="line-2"></a>तलफत नित जलहीन-मीन ज्यों, बहत रहत दृग-नीर।  
<a id="line-3"></a>"हा प्राणेश्वरि! हा राधे!"कहि, बिलपत, कुंज-कुटीर।  
<a id="line-4"></a>पुनि मुर्छित ह्वै गिरत छिनहिं छिन, नेकहुँ धरत न धीर।  
<a id="line-5"></a>प्रानन आन परी है अब तो, सहि न जाति उर-पीर।  
<a id="line-6"></a>चलु “कृपालु” द्रुत ललिहिं मनावन, प्रान जात न तु वीर!॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्रीलाड़िली जी के वियोग में श्रीश्यामसुन्दर की दुःखद अवस्था का एक सखी का दूसरी सखी से कहना।) किशोरी जी के बिना प्रियतम परम व्याकुल हो रहे हैं। जिस प्रकार जल के बिना मछली तड़पती है, उसी प्रकार लाड़िलीजी के बिना लालजी तड़प रहे हैं तथा लताओं के कुँज में रोते रहते हैं। एक-एक क्षण में मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं तथा 'हा प्राणेश्वरि! हा राधे!!'ऐसी रटना लगाते हैं। किंचित् भी धैर्य नहीं धारण कर पाते। अब तो श्यामसुन्दर के प्राणों पर आ बनी है, उनसे यह वियोग का दुःख सहा नहीं जाता। अतएव 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखी! अब तो शीघ्र चलकर किशोरी जी को मनाना चाहिए, अन्यथा उनके वियोग में श्यामसुन्दर का प्राण ही निकल जायगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 647-648

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
