# बलि जाउँ मनावन-मान की।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0673-M16-K020
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 20
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 317–317

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>बलि जाउँ मनावन-मान की।  
<a id="line-2"></a>मानिनि श्री वृषभानुनंदिनी, की छवि भौहँ-कमान की।  
<a id="line-3"></a>सजल-नयन, तनु-कंप, जुरे-कर, सभय-बिलोकनि कान्ह की।  
<a id="line-4"></a>कहन चहत कछु कहि न सकत, भौं, लखत लली वृषभान की।  
<a id="line-5"></a>पल-पल कलप जनात, दशा ज्यों, बिनु जल मछली प्रान की।  
<a id="line-6"></a>यह “कृपालु” दंपति-कौतुक सखि, देखति कुंज-लतान की॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(मानिनी राधिका जी को मनाते हुए श्यामसुन्दर के मैं किशोरी जी के मान एवं लालजी के मजाने की बार गार बलैया लेता हूँ। मैं मानिनी वृषभानुनन्दिनी की कोप री तनी हुई भौंहों की बलैया लेता हूँ। एवं आँखों में आँसू ररे काँपते हुए हाथ जोड़कर खड़े हुए, भयपूर्वक उनकी मोर देखते हुए, श्यामसुन्दर की बलैया लेता हूँ। प्रियतम कुछ कहना तो चाहते हैं किन्तु साहस नहीं होता, वे केवल केशोरी जी की भौंहों को ही बार-बार देखते जाते हैं अर्थात् जब उनका क्रोध कुछ कम हो तब प्रार्थना करें। प्रियतम के लए उस समय एक-एक क्षण कल्प के समान व्यतीत हो हा था एवं उनकी अवस्था ठीक बिना जल की मछली के पमान थी। 'कृपालु' कहते हैं कि प्रिया-प्रियतम के इस कौतूहल को सखियाँ कुंज में चुपके से बैठकर लताओं के बीच से देख रहीं थीं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 637-638

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
