# छैल भल, अटपट भेष बनायो।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0670-M16-K017
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 17
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 315–315

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>छैल भल, अटपट भेष बनायो।  
<a id="line-2"></a>चंद्रावलि-पद बंदि भाल निज, लाल, लाल करि लायो।  
<a id="line-3"></a>दै उपहार पीत अंबर निज, अरुण-ओढ़नी भायो।  
<a id="line-4"></a>बिखरे केश, नैन रतनारे, मुरली कित बिसरायो।  
<a id="line-5"></a>वचन अरबरे, स्वेद, कंप तनु, तव अपराध जतायो।  
<a id="line-6"></a>धनि-धनि निलज! आजु छल उघर्यो, भली करी जो आयो।  
<a id="line-7"></a>सुनि “कृपालु” कटु वचन लली के, लाल दृगन तम छायो॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्री श्यामसुन्दर चन्द्रावलि के यहाँ से प्रातःकाल कशोरी जी के महल में पहुँचते हैं एवं किशोरी जी व्यंग्य भरे ब्दों में कहती हैं। अरे प्रियतम श्यामसुन्दर! ष बना रखा है। चन्द्रावली के चरण-कमलों पर आँसू बहाते ए अपने ललाट में क्या ही सुन्दर लाल-लाल मिहावर का पगार कर रखा है। अपना पीताम्बर भी भेंट में उन्हीं को दे माये हो, कदाचित् आजकल तुम्हें लाल रंग की ओढ़नी ही गाने लगी है। क्या ही सुन्दर लाल ओढ़नी है, बिखरे हुए बाल वं रात भर जागने से लाल-लाल आँखे क्या ही शोभा दे रही अरे प्रियतम! अपनी प्राणाधिक-प्रिय मुरली भी साथ रखने गा तुम्हें अब ध्यान नहीं रहा। छोड़ आये? रुक-रुककर अटकते हुए बातें करना, शरीर में नप एवं पसीना होना, यह सब तुम्हारे अपराधों के प्रत्यक्ष चहू हैं। अरे निर्लज्ज! पष्ट रूप से प्रकट हो गया। मवस्था में यहाँ चले आये, अन्यथा यह रहस्य किस प्रकार स्पष्ट होता? 'कृपालु' कहते हैं कि ऐसा कहकर किशोरी जी ने कुपित होकर मान कर लिया तथा श्यामसुन्दर को आँखों के आगे डर के मारे अँधेरा-सा छा गया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 634-635

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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