# सखी! मैं, बिकी आजु बिनु दाम।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0639-M15-K056
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 56
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 300–300

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! मैं, बिकी आजु बिनु दाम।  
<a id="line-2"></a>कियो न मोल-तोल कछु मोते, लियो मोल घनश्याम।  
<a id="line-3"></a>करि तन, मन, अरु प्रान निछावरि, भइ जग सों बेकाम।  
<a id="line-4"></a>अब सोइ नाम-रूप-गुन-लीला, सुमिरत आठों याम।  
<a id="line-5"></a>भुक्ति -मुक्ति तजि पियत प्रेम-रस, कान्त भाव निष्काम।  
<a id="line-6"></a>जाको चहत “कृपालु” पिया बस, सोइ सुहागिनि बाम॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक गोपी का प्यारे श्यामसुन्दर से प्रथम-मिलन एवं उसका अपनी सखी से कहना।) अरी सखी! आज मैं तो बिना मोल के ही बिक गई। उस प्यारे श्यामसुन्दर ने बिना कुछ मोल-तोल अर्थात् बात-चीत किये ही मुझे मोल ले लिया, अर्थात् सदा के लिए अपनी बना लिया। मैं भी तन, मन, प्राण आदि सर्वस्व देकर संसार से सदा के लिए पृथक हो गई। अरी सखी! अब मैं श्यामसुन्दर के नाम, रूप, गुण, लीला का निरन्तर ही स्मरण कर रही हूँ। संसार के सुख एवं मोक्ष आदि के सुख, सभी को छोड़कर कान्तभावयुक्त निष्काम-प्रेम का ही निरंतर पान कर रही हूँ। कृपालु'कुछ लम्बी साँसें भरते हुए कहते हैं कि जिसको पिया चाहता है वही सुहागिनी स्त्री हो सकती है अर्थात् मुझ अभागिनी के भाग्य में ऐसा विधाता ने अभी तक विधान ही नहीं रचा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 607

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
