# मोहि लइ, मोहिं मोहन-मुसकान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0623-M15-K040
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 40
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 293–293

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मोहि लइ, मोहिं मोहन-मुसकान।  
<a id="line-2"></a>भानु-ललिहिं गुनगान करत रह, तानन कुंज लतान।  
<a id="line-3"></a>लखी कान्ह-मुसकान तान केइ, ध्यान भान, अनजान।  
<a id="line-4"></a>सुनी तान जब कान कान्ह की, रह्यो न प्रानन भान।  
<a id="line-5"></a>कान तान, अँखियान चहत पुनि, सोइ मुसकान न आन।  
<a id="line-6"></a>प्रान “कृपालु” पयान करन चह, आन मिलहु मम प्रान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक गोपांगना का नन्दनन्दन से प्रथम-प्रेम एवं उसका अपनी अन्तरंग सखी से प्रकट करना-) अरी सखि! मुझको मनमोहन की मधुर मुस्कान ने मोहित कर लिया। एक दिन वह नन्दनन्दन कान्ह निकृंज-लतान में गा होकर मुरली की तान में वृषभानुनन्दिनी के गुण-गान कर रहा था। मैंने अनजाने में मुरली की तान के ध्यान में अचानक कान्ह की मुस्कान देख ली। जब कान ने कान्ह की मुरली की तान सुनी तब प्राण ने भी अपना भान खो दिया। अब कान पुनः वही मुरली की तान सुनना चाहते हैं एवं नयन वही रसभरी मुस्कान देखना चाहते हैं। कृपालु' कहते हैं इन दोनों के झगड़े में प्राण शरीर छोड़कर अन्तिम प्रयाण करना चाहता है। अंतएव हे प्राण के प्राण!! पुन: आकर शरीर स्वरूप ब्रजगोपी से मिल लो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 593-594

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
