# चलीं दधि, बेचन ब्रज की बाम।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0606-M15-K023
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मिलन-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 23
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 285–286

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>चलीं दधि, बेचन ब्रज की बाम।  
<a id="line-2"></a>मटुकी शीशधरी रसमाती, पहुँचीं सब नँदगाम।  
<a id="line-3"></a>नंदद्वार भइँ जुरि ठाढ़ी जहँ, नव-लख-धेनु ललाम।  
<a id="line-4"></a>लो कोउ दही, टेर भूली कह,"लो कोउ सुंदर श्याम"।  
<a id="line-5"></a>लखि बेहाल ब्रजबाल, लाल तहँ, आये तजि निज धाम।  
<a id="line-6"></a>दधि बेचन हरि मिलहिं"कृपालुहिं"एक पंथ दो काम॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्यामसुन्दर के मधुर-मिलन की आकांक्षा में गोपियाँ दही बेचने के बहाने नंदगाँव जाती हैं।) ब्रज की गोपियाँ दही बेचने जा रही हैं। दही की मटुकी सिर पर रखकर श्यामसुन्दर के प्रेम-रस में विभोर नंदगाँब की ओर चलां, तथा सब इकट्ठी होकर नंदजी के द्वार पर खड़ी हो गईं, जिन नंदजी के घर में एक-से-एक बढ़िया नौ लाख गायें हैं। जब द्वार पर अपने प्यारे श्यामसुन्दर को नहीं देखा, तब विरह में व्याकुल होकर अपनी सुधि-बुधि भूल गईं। जिसके परिणामस्वरूप 'कोई दही लो'इस पुकार को छोड़कर "कोई सुन्दर-श्याम लो'ऐसी टेर लगाने लगीं। गोपियों को अत्यन्त विरह में व्याकुल देखकर श्यामसुन्दर तत्क्षण ही अपने घर से बाहर निकल आये, एवं उन गोपियों को दर्शन देकर कृतार्थ किया। 'कृपालु' कहते हैं कि तुम भी सखी बनकर वहीं चलो हर दही भी बेचेंगे एवं श्यामसुन्दर से भी मिलेंगे। "एक पंथ दो काज'इस लोकोक्ति के अनुसार दोनों ही कार्य सिद्ध हो जायेंगे।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 580-581

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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