# बलि जाउँ निकुंज विहार की।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0572-M14-K018
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: निकुंज-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 18
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 269–269

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>बलि जाउँ निकुंज विहार की।  
<a id="line-2"></a>नागरि श्री वृषभानु कुँवरि अरु, नागर नंदकुमार की।  
<a id="line-3"></a>धरि जनु रूप अनूप प्रकट भइँ, मूरति छवि श्रृंगार की।  
<a id="line-4"></a>करत केलि भुज मेलि विविध विधि, बरसावत रसधार की।  
<a id="line-5"></a>संग नवेलिन, अति अलबेलिन, हेलिन यूथ अपार की।  
<a id="line-6"></a>पियत “कृपालु” रसिक निशि वासर, प्रेम सुधा रस सार की॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक सखी कहती है-मैं प्रिया-प्रियतम के निकुंर में विविध प्रकार के रास-विहार की बार-बार बलैया लेती हूँ मैं प्रेम रस की आचार्या वृषभानुनन्दिनी एवं रसिक शिरोमरि नँदनंदन की बार-बार बलैयाँ लेती हूँ। मानो श्रृंगार एवं रू को मूर्ति ही साक्षात् राधा-कृष्ण का स्वरूप धारण करके प्रेः के अन्तरंग रसों को बरसाने के लिए अवतरित हुयी है। प्रिया प्रियतम परस्पर गले में हाथ डाले हुए विविध प्रकार क अन्तरंग लीला विहार करते हुए प्रेम रस को मूसलाधार बरर रहे हैं, मैं उसकी भी बलैयाँ लेती हूँ। प्रिया-प्रियतम के साः किशोर अवस्था वाली प्रेमरस की रॅँगीली अनंत गोपियों झुँड की बार-बार बलैया लेती हूँ। 'कृपालु' कहते हैं दि प्रेमरस के सार-स्वरूप अमृत को रसिक लोग निरंतर ही पिर करते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 551

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
