# देखु सखि, युगल नवल सरकार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0504-M11-K005
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: युगल-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 5
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 234–235

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>देखु सखि, युगल नवल सरकार।  
<a id="line-2"></a>पीत वरन उत नागरि ता पर, नीलांबर बलिहार।  
<a id="line-3"></a>नील-वरन इत नागर ता पर, पीतांबर रिझवार।  
<a id="line-4"></a>उत अति सरल सुभायन मोहिनि, मोहति नंदकुमार।  
<a id="line-5"></a>इत अति चपल सुभायन मोहन, मोहत भानुदुलार।  
<a id="line-6"></a>लखि जोरी “कृपालु” बरजोरी, शंभु समाधि बिसार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! श्यामा-श्याम की मनोहर झाँकी देख! उधर तो पीले रंग की वूषभानुनन्दिनी के ऊपर नीले रंग का वस्त्र शोभित हो रहा है और इधर नीले रंग के श्यामसुन्दर के ऊपर पीले रंग का वस्त्र अपनी छटा दिखा रहा है। उधर तो श्री किशोरी जी अपने अत्यन्त सरल स्वभाव से श्यामसुन्दर को कर रही हैं और इधर श्यामसुन्दर अपने अत्यन्त चंचल स्वभाव से श्री किशोरी जी को मोहित कर रहे हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इस मनोहर युगल जोड़ी को देखकर बरबस भगवान् शंकर अपनी ब्रह्म समाधि भूल जाते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 485-486

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
