# लली-दृग छवि लखि कवि भरमाये।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0482-M10-K040
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीराधा-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 40
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 225–225

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लली-दृग छवि लखि कवि भरमाये।  
<a id="line-2"></a>नयन कमल कहँ कमल-नयन कह, उलटी चाल चलाये।  
<a id="line-3"></a>आघूर्णित-पक्ष्मल-अपांग-दुति, श्वेत-अरुण दरसाये।  
<a id="line-4"></a>चंचल-इंद्रनील-गोलामल, श्यामल-तारा भाये।  
<a id="line-5"></a>मृग चकोर-दृग कमल-सार-रस, यंत्र निमेष खिंचाये।  
<a id="line-6"></a>सोइ पियूष-उद्गार समन्वित, सार सुनैन सुहाये।  
<a id="line-7"></a>अति चंचल दोउ नैन पृष्ठ सिर, कबहूँ नहिं मिलि पाये।  
<a id="line-8"></a>लखि “कृपालु” श्रुति-कूप-पतन-भय, मनहुँ मनहिं डरपाये॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

किशोरी जी की आँखों की शोभा देखकर कवियों की बुद्धि भ्रम में पड़ गयी। नयन समान कमल को, कमल के समान नयन कहने लगे, यह उल्टी बात है। किशोरी जी के नेत्र तो साक्षात् कमल हैं एवं दिव्य नेत्र भी हैं। उनकी उपमा कमल से देना पागलपन नहीं तो क्या है? अर्ध-विकसित कमल की दन कलम के समान किशोरी जी के अधखुले, रस भरे नेत्र हैं एवं पलकों के निम्न भाग की कांति से नेत्र-कमल में सफेदी एवं लालिमा है तथा चंचल गोल इन्द्र-नीलमणि के समान तारा (पुतली) ही भौंरा है। अतएव किशोरी जी के नेत्र कमल से भी अधिक सुन्दर कमल हैं, फिर साथ ही द्रष्टा भी हैं। किशोरी जी के नेत्र अमृत से युक्त हिरन के नेत्र (चन्द्रमा के बीच में हिरन के रहने के कारण) एवं चकोर के नेत्र ( अमृतमयी चन्द्रमा को पीने के कारण) तथा कमल के फूलों (चन्द्रवंशी होने के कारण) के तत्त्व को पलक-रूपी यंत्र से निकालकर अमूत-रस से युक्त बनाये गये हैं। किशोरी जी के नेत्र अत्यन्त ही चंचल होने के कारण कान तक बड़े-बड़े हैं किन्तु आश्चर्य है कि वे सिर के पिछले भाग में जाकर अभी तक नहीं मिल सके। 'कृपालु' कहते हैं कि कान-रूपी कुएं में गिरने के डर से कदाचित् ऐसा नहीं हो सका।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 465-466

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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