# कुँवरि नथ बेसर छवि छविदार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0456-M10-K014
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीराधा-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 14
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 213–214

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कुँवरि नथ बेसर छवि छविदार।  
<a id="line-2"></a>धनि जिन झूमि झूमि मुख चूमति, धनि जिन तिनहिं निहार।  
<a id="line-3"></a>वा बाँकी झाँकी का कहिये, लर मोतिन बलिहार।  
<a id="line-4"></a>कनक मुकुटहूँ पर लर मोतिन, कैसो है श्रृंगार?।  
<a id="line-5"></a>सेंदुर काजर मेहँदी मिहावरि, चूनरि जरिन किनार।  
<a id="line-6"></a>लखि “कृपालु” चितवनि मृदु मुसकनि, घायल नंदकुमार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्री किशोरी की नथ एवं बेसर की सुन्दरता, सुन्दरता से भी अधिक सुन्दर है। उस नथ-बेसर को धन्य है जो झूम-झूमकर प्रियाजी के मुख का चुम्बन करती है और उन जीवात्माओं की आँखों को भी धन्य है जो इस बाँकी झाँकी का दर्शन करती हैं। कान-पर्यन्त मोतियों की लड़ का शृंगार तो सर्वथा अनिर्वचनीय है। स्वर्ण के मुकुट पर मोतियों की लड़ें कितनी सुन्दर लगती हैं! सिर में सिन्दूर, आँख में काजल हाथ में मेहंदी, चरणों में मिहावर, एवं जरी के किनारों से युक्त चुनरी अत्यन्त ही मनोहारी है। 'कृपालु' कहते हैं कि किशोरी जी की प्रेमभरी चितवन एवं रसभरी मुसकान को देखकर त्रिभुवनमोहन श्यामसुन्दर भी आत्म विस्मृत हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 444-445

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
