# हमारो, दृग-अंजन नँदलाल।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0435-M09-K047
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीकृष्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 47
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 204–204

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हमारो, दृग-अंजन नँदलाल।  
<a id="line-2"></a>कुंचित कच निकुरंब विडंबित, विलुलित-अलि-कुल-माल।  
<a id="line-3"></a>सिर शिखि पुच्छ तिलक गोरोचन, लोचन कमल विशाल।  
<a id="line-4"></a>मत्त मधुव्रत गुन गुन गुंजित, गल दोलित वनमाल।  
<a id="line-5"></a>मंद-स्मित-मुख-चारु विलोकनि, मोहिनि सब ब्रजबाल।  
<a id="line-6"></a>कटि किंकिनि कलरव मनरंजिनि, मुखरित बेनु रसाल।  
<a id="line-7"></a>चलत “कृपालु” झूमि झुकि लटपट, लजवत चाल मराल॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

प्यारे श्यामसुन्दर हमारी आँखों के अंजन के समान हैं। उनके लटकते हुए घुँघराले बाल चंचल भौंरों के झुंड को भी लज्जित करगे वाले हैं। उनके सिर पर मोर पंख का मुकुट एवं ललाट में गोरोचन का तिलक लगा हुआ है तथा उनकी आँखें कमल के समान बड़ी-बड़ी हैं। उनके गले में लटकती हुई वनमाला के ऊपर मतवाले भौँरे गुन-गुन-गुन गुन गुंजार कर रहे हैं। उनकी मधुर मन्द मुस्कान से युक्त सुन्दर चितवनि समस्त ब्रजांगनाओं को मोहित कर रही है। उनकी कमर में मन को मुग्ध करने वाली किंकिणी की मधुर ध्वनि हो रही है तथा मुख से मधुर मुरली बजा रहे हैं। कृपालु' कहते हैं कि वे झूमते हुए झुक-झुककर ऐसी लटपट चाल चलते हैं कि उन्हें देखकर हंस भी अपनी चाल पर खिन्न होते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 427-428

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
