# ग्वाल सँग जेंवत बाल गुपाल।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0334-M07-K066
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 66
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 156–156

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ग्वाल सँग जेंवत बाल गुपाल।  
<a id="line-2"></a>लेत सखनि मुख छोर कौर हरि, भाजत इत उत ग्वाल।  
<a id="line-3"></a>मनसुख मन सुख-सिंधु समाने, ठाने मन कछु चाल।  
<a id="line-4"></a>"हमरी दही पकौरी जो कोउ, खावै होय निहाल"।  
<a id="line-5"></a>सुनतहिं श्याम भये उठि ठाढ़े, खोलि वदन ततकाल।  
<a id="line-6"></a>मनसुख मुख डारन मिस लै दधि, चुपरि दियो हरि गाल।  
<a id="line-7"></a>लखि “कृपालु” बलि हँसे ग्वाल सब, दै पुनि पुनि करताल॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(सख्य-प्रेम से विभोर ब्रह्म श्रीकृष्ण अपनी भगवत्ता को भूलकर एक साधारण बालक की तरह सखाओं के संग भोजन करते हुए उन्हें प्रसन्न कर रहे हैं।) श्रीकृष्ण ग्वालबालों के साथ भोजन कर रहे हैं। बार-बार सखाओं के मुख से कौर छीन-छीनकर खा रहे हैं एवं ग्वाल इधर-उधर भाग रहे हैं जिनका अभिप्राय यह है कि हम अपना भोजन तुमको नहीं देंगे। इतने में ही मनसुखा अत्यन्त आनन्द में उन्मत्त मन में कुछ चाल सोचते हुए सखाओं के बीच में कहने लगा—'हमारी दही-पकौड़ी इतनी बढ़िया है कि जो कोई खाय बस खाता ही रह जाये।' यह सुनते ही तत्काल ही श्रीकृष्ण अपना मुँह खोलकर उठ खड़े हुए। मनसुखा ने भी मन में सोची हुई चाल के अनुसार श्रीकृष्ण के मुख में दही-पकौड़ी डालने के बहाने दही-पकौड़ी मुख के पास ले जाकर भी मुख में न डालकर गाल में ही दही चुपड़ दिया। 'कृपालु' कहते हैं कि ऐसा परिहास देखकर हम भी ग्वालों के साथ ताली बजा-बजाकर हँसने लगे। परिणाम स्पष्ट ही है कि बेचारे भोले-भाले श्रीकृष्ण खिसिया गये।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 327

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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