# उरहनो सुनि सुनि खीझीं माय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0321-M07-K053
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 53
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 149–149

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>उरहनो सुनि सुनि खीझीं माय।  
<a id="line-2"></a>अति रिस भरी खरी लै साँटी, कान्ह अचानक आय।  
<a id="line-3"></a>भाज्यो कान्ह देखि कर साँटी, सुधि बुधि तनु बिसराय।  
<a id="line-4"></a>आगे हरि पाछे यशुमति अति, धावति पकरि न पाय।  
<a id="line-5"></a>लखि जननी तनु अति रिस बाढ़ी, गिरे कान्ह घबराय।  
<a id="line-6"></a>रोवत कान्ह पकरि नँदरानी, बाँधे ऊखल लाय।  
<a id="line-7"></a>लै साँटी मारन जब धाई, सखियन पकरीं आय।  
<a id="line-8"></a>आरत कान्ह पुकारत छिन छिन, कोऊ लेहु बचाय।  
<a id="line-9"></a>अति सभीत तनु कंप नैन झरि, देखि सखिन नहिं जाय।  
<a id="line-10"></a>तब कह सखिन मातु मो घर हरि, चोरि न माखन खाय।  
<a id="line-11"></a>हौं तो करी मसखरी तू तो, साँचेहिं गइ पतियाय।  
<a id="line-12"></a>लखि “कृपालु” अकुलाय माय के, गहे पाँय बिलखाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(जब कई बार गोपियों के द्वारा यशोदा ने कृष्ण के गोपियों के द्वारा बार-बार दिए हुए उलाहनों को सुनकर यशोदा मैया अत्यन्त खीझ गयीं। अत्यन्त क्रोध में भरी हुई यशोदा हाथ में डंडा लेकर आज खड़ी हैं और कह रही हैं कि आज कन्हैया आवे तो मैं उसे अच्छी तरह ठीक कर दूँ, इतने में श्रीकृष्ण आ गये। श्रीकृष्ण दूर से मैया के हाथ में डंडा देखकर एवं मैया को अत्यन्त क्रोध में देखकर, अपनी सुधि-बुधि को भूलकर उल्टे पैर ही भागे। मैया ने भी पीछा किया। आगे आगे श्रीकृष्ण भाग रहे हैं, पीछे-पीछे मैया अपनी पूरी शक्ति से पकड़ने के लिए दौड़ रही है परन्तु बुढ़ापे के कारण पकड़ नहीं पा रही है। भागते-भागते जब श्रीकृष्ण ने यह जानना चाहा कि मैया लौट गई कि नहीं, तब उन्होंने मुड़कर पीछे की ओर देखा, किन्तु मैया को थकावट के कारण और भी क्रुद्ध देखकर घबड़ाकर गिर गये और रोने लगे। मैया ने रोते हुए कृष्ण को पकड़कर ऊखल में बाँध दिया और जैसे ही डंडा लेकर मारने को दौड़ीं वैसे ही सखियों ने दौड़कर पकड़ लिया श्रीकृष्ण अकिंचन की भाँति आर्त बनकर रोते हुए बार-बार यही कहते हैं कि आज मुझे कोई बचा लो। श्रीकृष्ण इतने डरे हुए हैं कि उनका शरीर काँप रहा है तथा आँसुओं की झड़ी लगी हुई है। इस दुःखद अवस्था को देखकर प्रेममयी सखियों से नहीं रहा गया। तब सखियों ने कहा कि मैया! श्रीकृष्ण मेरे घर में चोरी करके मक्खन नहीं खाता, मैंने तो यों ही परिहास रूप में कह दिया था। तू तो सचमुच ही समझ बैठी। कृपालु कहते हैं कि प्यारे श्यामसुन्दर की उपर्युक्त अवस्था मुझसे भी नहीं देखी गयी और मैं भी दौड़कर परमव्याकुलतावश मैया के चरण पकड़कर रोने लगा, जिसका अभिप्राय यह था कि अब बहुत हो चुका, लाला को छोड़ दो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 314-315

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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