# मैया री! मैं नहिं माटी खायो।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0312-M07-K044
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 44
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 145–145

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मैया री! मैं नहिं माटी खायो।  
<a id="line-2"></a>जाकी भृकुटि विलास प्रलय सोइ, साँटी लखि डरपायो।  
<a id="line-3"></a>दोउ कर-उदर बँधे दामोदर, दृग झर झर झरि लायो।  
<a id="line-4"></a>मति मारिय मैया! मोहिं भैया, गैयां नित हँकवायो।  
<a id="line-5"></a>तू बरजति लालन! गैयन बिच, भूलि कबहुँ जनि जायो।  
<a id="line-6"></a>आजु न गयों बहोरन गैया, भैया मोहिं धमकायो।  
<a id="line-7"></a>हारे कालि खेल महँ मोते, याहू ते खिसियायो।  
<a id="line-8"></a>कछु बस चल्यो न जब मैया, सों, झूठी आय लगायो।  
<a id="line-9"></a>मैया कह"मुख खोलि दिखावहु", तब हरि कछु मुसकायो।  
<a id="line-10"></a>अति ही प्रबल योगमाया-बल, रूप विराट दिखायो।  
<a id="line-11"></a>लखि कोटिन ब्रह्माण्ड एक मुख, यशुमति अति अकुलायो।  
<a id="line-12"></a>तब “कृपालु” भये सौम्य श्याम इमि, दामोदर पद पायो॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(बलराम के कथनानुसार मिट्टी खाने के अपराध में श्रीकृष्ण को यशोदा ने बाँध दिया है, एवं डण्डा लेकर मारने के लिए तैयार खड़ी हैं।) उसी अवस्था में श्रीकृष्ण अत्यन्त दीन भाव से कातर होकर मैया से कह रहे हैं, 'मैया मैंने मिट्टी नहीं खाई।' कवि कहता है कि जिन श्रीकृष्ण की भृकुटि-विलास-मात्र से अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों का प्रलय हो जाता है, वे ही श्रीकृष्ण आज यशोदा के वात्सल्य-प्रेम में बँधे हुए एक छोटे से डण्डे से भयभीत हो रहे हैं। श्रीकृष्ण के दोनों हाथ पेट के साथ बँधे हुए हैं एवं आँखों से आँसुओं की धारा बह रही है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैया! मुझे मत मार, मेरी बात तो सुन ले। बात यह है कि तू मुझे बार-बार यह शिक्षा देती है कि लाला तू भूलकर भी गायों के बीच में मत जाया कर फिर भी बलदाऊ भैया मुझसे प्रतिदिन गायों को हँकवाते हैं। आज मैं तेरी ही बात मानकर गायों को हाँकने नहीं गया। इस पर बलदाऊ भैया ने मुझे बड़ी धमकी दी कि आज मैया के पास चलो तो तुम्हें पिटवायेंगे। दूसरा कारण यह भी है कि बलदाऊ भैया मुझसे कल खेल में हार गये थे, इससे भी बहुत खिसियाये हुए थे। इन दोनों ही कारणों से जब कोई वश नहीं चला तब तुमसे आकर मिट्टी खाने की झूठी-मूठी बात गढ़कर लगा दी। यशोदा ने कहा, अच्छा, 'तुम अपना मुख खोलकर दिखाओ।' अब तो श्रीकृष्ण कुछ मुस्कराने लगे। (श्रीकृष्ण जब कोई लीला करना चाहते हैं, तब गम्भीर मुद्रा में मुस्कराते हैं।) श्रीकृष्ण ने अपनी अलौकिक योगमाया से अपने मुख में अनंत कोटि ब्रह्माण्डों से युक्त अपना विराट् स्वरूप दिखला दिया। अपने लाल के भोले-भाले छोटे से मुख में यह सब देखकर मैया अत्यन्त व्याकुल होकर डर गई। 'कृपालु' कहते हैं कि श्रीकृष्ण मैया को डरी हुई देखकर वात्सल्य-रस के अनुसार फिर अपने स्वरूप में आ गये, इस प्रकार श्रीकृष्ण को दामोदर पद प्राप्त हुआ। (दामोदर-दाम=रस्सी, उदर=पेट)

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 305-307

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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