# नंदघर निरतत नंदकुमार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0293-M07-K025
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 25
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 135–136

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>नंदघर निरतत नंदकुमार।  
<a id="line-2"></a>तांडव नृत्य करत जनु शंकर, यशुमति अजिर मझार।  
<a id="line-3"></a>धूरि धूसरित तनु इमि सोहति, जनु लेपित तनु छार।  
<a id="line-4"></a>गल विशाल कमलन की माला, मुंडमाल अनुहार।  
<a id="line-5"></a>मोर पंख मिस कालकूट विष, रहे शीश निज धार।  
<a id="line-6"></a>केहरि-नख मिस शशि धरि कंठहिं, थल भल उचित विचार।  
<a id="line-7"></a>जानि “कृपालु” दिगंबर शंकर, डरपत मदन निहार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(कवि नंद के घर में नाचते हुए श्रीकृष्ण की शंकर जी से तुलना करता है।) आज नंद के घर में श्रीकृष्ण शंकरजी के समान बनकर मानो तांडव नृत्य कर रहे हैं। यशोदा जी के आँगन में धूलि से सफेद-से हुए श्रीकृष्ण ऐसे लगते हैं मानो शंकर जी ने भस्म का लेपन कर रखा है। कृष्ण के गले में कमल के बड़े-बड़े फूलों की माला ही मानों शंकर जी की मुँडमाला की समानता कर रही है। मोर पंख में जो नीलिमा है, मानो वही शंकर जी के कण्ठ में रहने वाला विष है, जिसे विष समझकर श्रीकृष्ण ने अपने गले में न धारण करते हुए शरीर से बाहर मोर पंख में धारण कर रखा है। बाघ के नाखून को पहने हुए श्रीकृष्ण मानो शंकर जी की तरह सिर के बजाय गले में ही चन्द्रमा को धारण कर लिया है। यह दोनों ही स्थल इसलिए बदल दिये गये हैं कि श्रीकृष्ण को अपना वंश प्रिय है, इसलिए चन्द्रमा को गले लगाया, एवं विष प्रिय नहीं है, इसलिए उसे मोर पंख में रखा। 'कृपालु' कहते हैं कि इस प्रकार अति लघु बालक रूप नंगे-धड़ंगे श्रीकृष्ण को साक्षात् शंकर ही समझकर कामदेव डर रहा है कि कहीं ऐसा न हो ये शंकर जी हमें पूर्व की भाँति भस्म कर दें।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 288-289

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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