# "जयराम योगी!""जयराम माय!"।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0275-M07-K007
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 7
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 126–127

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>"जयराम योगी!""जयराम माय!"।  
<a id="line-2"></a>योगी शिव अरु मातु यशोमति, रहे दोउ बतराय।  
<a id="line-3"></a>ओ जोगी! निज भेष भयानक, कारन कौन बनाय?।  
<a id="line-4"></a>सुनु मैया! तुम्हरे लाला के, कारण स्वाँग रचाय।  
<a id="line-5"></a>ओ जोगी! द्वै दिन के लालहिं, काहे दोष लगाय।  
<a id="line-6"></a>सुनु मैया! यह लाल सनातन, ब्रह्म निगम अस गाय।  
<a id="line-7"></a>ओ जोगी! क्यों बात बनावत, मो ते जो तेहि जाय।  
<a id="line-8"></a>सुनु मैया! यह लाल अजन्मा, लै अवतार सिधाय।  
<a id="line-9"></a>ओ जोगी! मम केश श्वेत भये, काहे मोहिं पढ़ाय।  
<a id="line-10"></a>सुनु मैया! यह दास आदि जग, तव सुत-सुत-सुत आय।  
<a id="line-11"></a>ओ जोगी! लै भीख जाहु घर, तोहिं उनमाद जनाय।  
<a id="line-12"></a>सुनु मैया! मोहिं भीख इहै चह, दे मोहिं लाल दिखाय।  
<a id="line-13"></a>ओ जोगी! क्यों बैर परे मम, लखि तोहिं लाल डराय।  
<a id="line-14"></a>सुनु मैया! तू भोरी याके, डर ते डर डरपाय।  
<a id="line-15"></a>ओ जोगी! भल शाप देहुँ मोहिं, पै न लाल लखि पाय।  
<a id="line-16"></a>सुनु मैया! तोरी जो इच्छा, कहि लौटे खिसियाय।  
<a id="line-17"></a>शंभु दरस हित बैठि यमुन तट, दृग-अँसुवन झरि लाय।  
<a id="line-18"></a>उत कहि"कहाँ, कहाँ"जनु लालहुँ, नैनन नीर बहाय।  
<a id="line-19"></a>सखिन कह्यो कछु कै गयो जोगी, आई यशुमति धाय।  
<a id="line-20"></a>ओ जोगी! हौं पाँय परौं चलु, लाला तोहिं बुलाय।  
<a id="line-21"></a>चलु मैया! “कृपालु” कहि जोगी, मिलत हँस्यो बलभाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

योगीराज भगवान् शंकर एवं यशोदा मैया एक दूसरे से जयराम जी की करने के पश्चात् परस्पर बात कर रहे हैं। मैया पूछती है '"योगीराज तुमने अपना भयानक भेष क्यों बना रखा है?''योगीराज शंकर उत्तर देते हैं '"मैया! लाला के कारण ही बनाया है। मेरे दो दिन के लाला के ऊपर क्यों लांछन लगा रहे हो? योगीराज कहते हैं ''मैया, यह तेरा लाला वेदों के सिद्धांतानुसार दो दिन का नहीं है वरन् सनातन भगवान् है। योगीराज! मैंने तो उसे अपने पेट से पैदा किया है फिर तुम मुझसे ऐसी बातें क्यों बना रहे हो? मैया यह तुम्हारा लाल किसी का पुत्र नहीं हो सकता। वह अजन्मा भगवान् तो लीला के हेतु अवतार लेकर ही आया है।''मैया कहती है, "योगीराज! तुम मुझे पट्टी नहीं पढ़ा सकते। मैया! यह दास तो सृष्टि के प्रारम्भ से ही है। दास तुम्हारे बेटे के बेटे (ब्रह्मा) का बेटा (शंकर) है। ने कहा, "योगीराज, तुम्हें जो भीख लेना हो लेकर अपने आश्रम पर जाओ तुम्हें उन्माद रोग प्रतीत होता है। ने कहा-'"मुझे तो एकमात्र तुम्हारे लाला के दर्शन की ही भीख की भूख है।''मैया ने कहा, "योगीराज! क्यों पड़ गये हो। तुमको देखकर मेरा लाला डर जायगा। भगवान् शंकर ने कहा, "मैया तू बड़ी भोली है इसके डर से तो साक्षात् यमराज भी डरता है''मैया ने कहा-'योगीराज! चाहे मुझे आप ही क्यों न दे दो फिर भी मैं अपने लाला को नहीं दिखाऊँगी।''भगवान् शंकर ने कहा-"'मैया! इच्छा।''एवं खिसियाकर लौट गये। के दर्शन के लिए यमुना के किनारे बैठकर आँसुओं की झड़ी लगाते हुए प्रेम का सत्याग्रह प्रारम्भ कर दिया। ने भी "कहाँ कहाँ"का शोर करते हुए आँसुओं की झड़ी लगा दी। इतने ही में सखियों ने मैया से कहा, ''अरी मैया! उस योगी ने इस लाल के ऊपर कुछ जादू-टोना कर दिया है।''फिर क्या था, मैया भाग कर भगवान् शंकर के पास गयी। उनसे कहा, चलो, महाराज! मैं तुम्हारे पैर पड़ती हूँ। वह लाला तो सचमुच ही तुम्हें बुला रहा है। गये एवं मैया का भी काम बन गया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 271-273

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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