# हमारी निधि, श्री वृषभानु दुलार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0244-M04-K093
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 93
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 110–110

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हमारी निधि, श्री वृषभानु दुलार।  
<a id="line-2"></a>जाकी भृकुटि विलास विलोकत, नागर नंदकुमार।  
<a id="line-3"></a>ब्रज वीथिन बिच भयो बावरो, राधे राधे पुकार।  
<a id="line-4"></a>विकल नैन दिन-रैन दरस बिन, छिन छिन पंथ निहार।  
<a id="line-5"></a>भाग मनावत आपुन कबहुँक, लखौं चरन इक बार।  
<a id="line-6"></a>निज आराध्य ब्रह्म-दुर्गति लखि, लाजत ज्ञानि गमार।  
<a id="line-7"></a>मम “कृपालु” आंधे की लाकरि, राधे नाम अधार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हमारी निधि तो एकमात्र वृषभानुनन्दिनी श्री राधिका जी हैं, जिनकी भूकुटि-विलास को ब्रह्म श्रीकृष्ण भी नित्य देखता रहता है (जिनकी भौहों के इशारे पर ब्रह्म भी दास बनकर चलता रहता है।) ब्रज की गलियों-गलियों में दीवाना होकर वही ब्रह्म राधे, राधे'की पुकार किया करता है एवं जिन राधिका जीके दर्शन के लिए दिन-रात व्याकुल होकर विरही बना हुआ मग जोहता रहता है। जिन राधिका ज़ी के एक बार भी चरण कमलों के दर्शन के लिए अपना भूरि भाग्य मनाया करता है। वही वृषभानुनन्दिनी राधा हमारी सर्वस्व हैं ज्ञानीजन अपने आराध्य 'ब्रह्म'की उपर्युक्त दुर्दशाओं को देखकर अज्ञानतावश लज्जित होते हैं 'कृपालु' कहते हैं कि मुझ अत्रे के लिए तो राधे नाम रूपी लठिया का ही एकमात्र है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 247-248

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
