# श्याम हौं कब ब्रज बसिहौं जाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0238-M04-K087
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 87
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 107–107

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>श्याम हौं कब ब्रज बसिहौं जाय।  
<a id="line-2"></a>श्यामा श्याम नाम गुन गावत, कब नैनन झरि लाय।  
<a id="line-3"></a>कब विचरौं गहवर वन वीथिन, राधे राधे गाय।  
<a id="line-4"></a>कब झूमत वृंदावन-कुंजनि, फिरौं हिये हुलसाय।  
<a id="line-5"></a>कब लपटाय लतन गोवर्धन, कहौं हाय पिय हाय।  
<a id="line-6"></a>कब लोटत “कृपालु” ब्रज रज बिच, हौं जैहौं बौराय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! वह दिन कब आयेगा जब मैं सदा के लिए ब्रज में ही जाकर निवास करूँगा। कब राधा-कृष्ण के नाम एवं गुण गाते हुए मेरी आँखों से निरंतर अश्रू प्रवाह होगा। कब गह्रवन की गलियों में प्रेमपूर्वक 'राधे राधे'पुकारते हुए विचरण करूँगा। कब वृन्दावन के कुंजों में उल्लास भरे भावों से झूमते हुए फिरूँगा। कब गोवर्धन की लताओं का आलिंगन करके, अत्यन्त अधीर होकर तुम्हारे मधुर-मिलन की आकांक्षा में "हाय! पिय हाय!!'ऐसा कहुँगा। 'कृपालु' कहते हैं कि कब ब्रज की धूल में लोटते हुए मैं प्रियतम के प्रेम में विभोर होकर वास्तविक पागल बन जाऊँगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 242-243

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
