# मोहिं तो भरोसो है तिहारो री किशोरी राधे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0228-M04-K077
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 77
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 103–103

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मोहिं तो भरोसो है तिहारो री किशोरी राधे।  
<a id="line-2"></a>हौं जस अधम तुमहिं इक जानति,  
<a id="line-3"></a>और न जाननिहारो री किशोरी राधे।  
<a id="line-4"></a>भुक्ति मुक्ति नहिं माँगत केवल,  
<a id="line-5"></a>अपनो जानि निहारो री किशोरी राधे।  
<a id="line-6"></a>भयो तिहारो जानि राधिके!  
<a id="line-7"></a>ह्वै जैहौं मतवारो री किशोरी राधे।  
<a id="line-8"></a>पुनि कहँ रह अवकाश विषय को,  
<a id="line-9"></a>चारि पदारथ खारो री किशोरी राधे।  
<a id="line-10"></a>तुम “कृपालु” सरकार हमारी,  
<a id="line-11"></a>प्यार करो या मारो री किशोरी राधे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे रासेश्वरी राधे! मुझे तो एकमात्र तुम्हारा ही अवलम्ब है। मैं जिस कोटि का पतित हूँ, उसे तुम्हारे सिवा और कोई भी सांसारिक जीव नहीं जानता। संसार के सुखों से लेकर मोक्ष पर्यन्त का कोई भी सुख मैं नहीं माँगता। केवल यह माँगता हूँ कि तुम मुझे अपना समझकर अपनी कृपामयी दृष्टि से मेरी ओर देखो। जब मैं यह समझ लूँगा कि तुमने मुझे अपना बना लिया है, तब मैं आनन्द में विभोर होकर उन्मत्त हो जाऊँगा। जिसके परिणामस्वरूप सांसारिक विषय-वासनाएँ अपने-आप सदा के लिए समाप्त हो जायेंगी, एवं धर्म, अर्थ काम, मोक्ष ये चारों पदार्थ भी खारे लगने लगेंगे। कृपालु कहते हैं कि हे किशोरी जी! तुम हमारी स्वामिनी हो और सदा रहोगी, चाहे मुझे अपना समझकर प्यार करो चाहे पैरों से कुचलो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 235-236

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
