# पिया! मोहिं प्रेम-दान जनि दीजै।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0216-M04-K065
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 65
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 98–98

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>पिया! मोहिं प्रेम-दान जनि दीजै।  
<a id="line-2"></a>मधुर-मिलन लगि विकल प्राण रह, विरह-अगिनि तनु छीजै।  
<a id="line-3"></a>प्राण जाँय जब पंचतत्व तनु, निज परिकर करि लीजै।  
<a id="line-4"></a>प्रिया-मिलन दृगजल सों"जल"मिलि,""भूमि""चरण-रज कीजै।  
<a id="line-5"></a>कमल-नयन बिच"तेज","पवन"मिलि, सांसन जेहि पिय जीजै।  
<a id="line-6"></a>मिलि अकास जहँ महारास-रस, लली-लाल नित भीजै।  
<a id="line-7"></a>रह्यो प्राण सो प्राणनाथ को, क्यों “कृपालु” कर मीजै॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी अत्यंत चतुराईपूर्वक कहती है कि हे प्रियतम! मैंने सुना है कि आपको प्रेमदान करने में बड़ा ही कष्ट होता है। इसलिए मैं प्रेम नहीं चाहती। दूसरा कारण यह भी है कि प्रेमिका प्रेम प्राप्त कर लेने पः प्रियतम के मधुर-मिलन के लिए परम व्याकुल रहती है, एव उसका तन, मन, प्राण सभी विरह की आग में जलता रहता है मैं तो तुमसे यही याचना करती हूँ कि जब मैं मर जाऊँ, तब मेरे शरीर के पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, इन पाँच तत्तव को मेरे कथनानुसार तुम सदा के लिए अपना परिकर (दास) बना लो। मेरे शरीर का जल-तत्त्व आपकी आँखों की उस जलधारा में जाकर मिल जाय, जो किशोरी जी के मिलन के पमय आनंद में तुम्हारी आँखों से निकलती है। त्व आपके चरण कमलों की धूलि में मिल जाय। हे प्रियतम! सी प्रकार मेरा तेज-तत््व आपके कमल नेत्रों में, एवं वायु तत्त आपके श्वासों में मिल जाय। उस दिव्य सेवाकुंज में मिल जाय, जहाँ तुम एवं किशोरी जी धम विभोर होकर अनंत सखियों के साथ नित्य ही महारास के स में डूबे रहते हो 'कृपालु' कहते हैं कि यदि कोई अनजान गह कहे कि विरहिणी को अपने शारीरिक पंचतत्त्वों की इतनी चन्ता है, पर प्राणों की बिल्कुल नहीं, तो इसका उत्तर यह है के प्राण तो मेरा है ही नहीं वह तो प्राणनाथ श्यामसुन्दर का ही। उसे वे शरीर छोड़ने के बाद स्वयं अपने पास बुला लेंगे उसको मुझे क्या चिन्ता।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 225-226

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
