# किशोरी मोरी, बिगरी देहु बनाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0186-M04-K035
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 35
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 84–84

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>किशोरी मोरी, बिगरी देहु बनाय।  
<a id="line-2"></a>अति कोमल सुभाउ माँ तुम्हरो, वेद पुरानन गाय।  
<a id="line-3"></a>कासोँ कहूँ सुने को तुम बिनु? मुझ दुखिया की माय।  
<a id="line-4"></a>मोरी दशा भली तुम जानत, कबहुँ न अघन अघाय।  
<a id="line-5"></a>कपटी कुटिल कुपूत रावरो, इत उत ठोकर खाय।  
<a id="line-6"></a>भक्ति भाव कछु जानत नाहीं, बनत रसिक-रस-राय।  
<a id="line-7"></a>अपनी ओर निहारि राधिके!, अब तो लेहु अपनाय।  
<a id="line-8"></a>मोहन सों इक बार मिला दो, परूँ तिहारे पाय।  
<a id="line-9"></a>तुम्हरो माय! कहाय पूत अब, काके द्वारे जाय।  
<a id="line-10"></a>यह “कृपालु” हठ पुरवहु राधे!, न तु सुत मातु लजाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे ब्रजेशवरी राधिके! मेरी अनादि काल की बिगड़ी बना दीजिए। हे माँ राधे! तुम्हारा इदय अत्यन्त ही कोमल है ऐसा वेदों और पुराणों ने बताया है। तुमको छोड़कर मैं दुःखिया अपना दुःख और किससे कहूँ, यदि कहूँ भी तो उसे पूर्ण करने की सामर्थ्य भी दूसरों में कहाँ है। हमारी अन्तरंग अवस्था को तुम अच्छी तरह जानती हो कि निरन्तर अनन्तानन्त पापों को करते हुए भी, पापों से मेरा पेट नहीं भरता। तुम्हारा ही यह कपटी, दुष्ट कुपुत्र चौरासी लाख दरवाजों पर ठोकरें खा रहा है। माँ राधे! मेरे अन्तःकरण में नवधा-भक्ति के पाँचों भावों का लबलेश मात्र भी अंश नहीं है, फिर भी रसिकों का सिरमौर लोकरंजन के लिए बनता अवश्य हूँ। हे किशोरी जी! अपनी वात्सल्यमयी दृष्टि के द्वारा, अपनी ओर देखकर, मुझे अब तो सदा के लिये अपना बना लो। मैं तुम्हारे चरण पकड़कर बार बार यही मांगता हूँ कि प्यारे श्यामसुन्दर से एक बार अवश्य मिला दो। तुम्हारा पुत्र कहलाकर भी यदि मैं और किसी के द्वार पर जाऊँ तो यह शोभा नहीं देता। 'कृपालु' कहते हैं कि यह मेरा बाल-हठ अवश्य ही पूर्ण करो, अन्यथा यह पुत्र माता के नाम को कलंकित करेगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 200-202

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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