# सुनो सब जीव हमारी बात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0136-M03-K127
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 127
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 62–62

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सुनो सब जीव हमारी बात।  
<a id="line-2"></a>"यमेवैष वृणुते"मम वाणी, विश्व विदित विख्यात।  
<a id="line-3"></a>याको अर्थ शरण ह्वै जोइ भज, सोइ मोहिं पाइ सकात।  
<a id="line-4"></a>"गुह्याद् गुह्यतमं"गीता में, कह्यो गुप्त मत तात।  
<a id="line-5"></a>ताको अर्थ इहै मन बुधि दै, भजहु मोहिं दिन रात।  
<a id="line-6"></a>करहु “कृपालु” भजन तुम निशिदिन, देहु तर्क धरि पात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

भगवान् जीवों से कहते हैं कि हे जीवात्माओं! तुम आ हमारी बात सुनो! "यमेवैष वृणुते'यह मेरी वेद वाणी विश्वविदित है, जिसका वास्तविक अर्थ यह है कि जो जीव मेरी शरण होकर मेरी भक्ति करता है वही मुझे प्राप्त कर सकता है। और मैंने गीता में जो अत्यन्त गुप्त मत अर्जुन को बताया है उसका भी भाव यही है कि जो मन बुद्धि का समर्पण करके मेरी भक्ति करता है, मैं उसी पर कृपा करता हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि अब तुम निरन्तर भजन करो, तर्क कुतर्क समाप्त कर दो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 161

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
