# गये सब परमहंस बौराय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0044-M03-K035
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: सिद्धान्त-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 35
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 23–24

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>गये सब परमहंस बौराय।  
<a id="line-2"></a>जिन सनकादि समाधि-सनक तिन, बने बिटप ब्रज आय।  
<a id="line-3"></a>जिन कह"अलख"कहतसोइ"आलख", पूर्ण ब्रह्म बलभाय।  
<a id="line-4"></a>जिन कह ब्रह्म अनाम अगुन तिन, सगुन नाम गुन गाय।  
<a id="line-5"></a>जिन कह"सोऽहं"तिन"दासोऽहं", कहि-कहि बलि-बलि जाय।  
<a id="line-6"></a>जिन “कृपालु” कह आनँदमय हम, तिन अँसुवन झरि लाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

ब्रज में समस्त परमहँस पागल हो गये। जिन सनकादिक परमहँसों को समाधि की सनक थी वे सब ब्रज में वृक्ष बन-बन कर अवतरित हुए हैं। जो परमहँस ब्रह्म को अलख'ऐसा कहा करते थे वे ही ब्रज में कहते हैं कि आलख-आलख अर्थात् आकर पूर्णब्रह्म श्यामसुन्दर को देख। जो परमहँस ब्रह्म को नाम गुण रहित कहा करते थे वे ही ब्रज में श्यामसुन्दर के नाम गुण गा रहे हैं। जो परमहँस अपने आपको 'सोऽहं'(मैं वही ब्रह्म हूँ) ऐसा कहा करते थे, वे ही ब्रज में "दासोऽहं '(मैं दास हूँ, श्यामसुन्दर हमारे स्वामी हैं) ऐसा कह-कहकर बलिहार जा रहे हैं 'कृपालु' कहते हैं कि जो परमहँस अपने आपको पूर्ण आनन्दमय कहा करते थे वे ही ब्रज में श्यामसुन्दर के विरही बनकर आँसू बहा रहे हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 88

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
