# युगल सरकार की आरती

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0008-M02-K002
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: आरती-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 2
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 5–6

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>युगल सरकार की आरती  
<a id="line-2"></a>आरती प्रीतम प्यारी की, कि बनवारी नथवारी की।  
<a id="line-3"></a>दुहुँन सिर कनक-मुकुट झलकै,  
<a id="line-4"></a>दुहुँन श्रुति कुंडल भल हलकै,  
<a id="line-5"></a>दुहुँन दृग प्रेम-सुधा छलकै,  
<a id="line-6"></a>चसीले बैन, रसीले नैन, गँसीले सैन,  
<a id="line-7"></a>दुहुँन मैनन मनहारी की।  
<a id="line-8"></a>दुहुँनि दृग-चितवनि पर वारी,  
<a id="line-9"></a>दुहुँनि लट-लटकनि छवि न्यारी,  
<a id="line-10"></a>दुहुँनि भौं-मटकनि अति प्यारी,  
<a id="line-11"></a>रसन मुखपान, हँसन मुसकान, दशन-दमकान,  
<a id="line-12"></a>दुहुँनि बेसर छवि न्यारी की।  
<a id="line-13"></a>एक उर पीतांबर फहरै,  
<a id="line-14"></a>एक उर नीलांबर लहरै,  
<a id="line-15"></a>दुहुँन उर लर-मोतिन छहरै,  
<a id="line-16"></a>कंकनन खनक, किंकिनिन झनक, नूपुरन भनक,  
<a id="line-17"></a>दुहुँन रुनझुन धुन प्यारी की।  
<a id="line-18"></a>एक सिर मोर-मुकुट राजै,  
<a id="line-19"></a>एक सिर चूनरि-छवि छाजै,  
<a id="line-20"></a>दुहुँन सिर तिरछे भल भ्राजै,  
<a id="line-21"></a>संग ब्रज-बाल, लाड़िली लाल, बाँह गल डाल,  
<a id="line-22"></a>“कृपालु” दुहुँन दृग चारी की॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हम प्रियतम श्यामसुन्दर एवं प्यारी श्री किशोरी जी को आरती करते हैं। दोनों के सिर पर सुवर्ण के मुकुट चमक रहे हैं दोनों के कानों में सुन्दर कुण्डल हिल रहे हैं। दोनों की आँखों में प्रेमामृत रस छलक रहा है। दोनों की वाणी अत्यन्त मधुर है। दोनों के नेत्र अत्यन्त सरस हैं। दोनों के कटाक्ष अत्यन्त ही तीखे हैं दोनों कामदेव के मन को भी हरने वाले हैं। मैं दोनों के परस्पर देखने पर बलिहार जाता हूँ। दोनों के घुँघराले बालों की छटा अत्यन्त ही निराली है। दोनों के भौहों के चलाने की रीति अत्यन्त ही आकर्षक है। दोनों के मुख में पान का रस है। दोनों का हँसना, मुस्काना मनमोहक है। दोनों के दाँतों की चमक अत्यन्त सुन्दर है। दोनों की बेसर की झाँकी तो अत्यन्त ही निराली है। श्री श्याम सुन्दर के वक्षस्थल पर पीताम्बर फहरा रहा है श्री किशोरीजी के वक्षस्थल पर नीलाम्बर लहरा रहा है तथा दोनों के वक्षस्थल पर मोतियों की लड़ियाँ झूम रही हैं। दोनों के कंकण, दोनों को किंकिणि एवं दोनों के नूपुर की रुनझुन ध्वनि अत्यन्त ही मनोहारिणी है। श्री श्याम सुन्दर के सिर पर मोर-मुकुट सुशोभित है, श्री किशोरी जी के सिर पर सुन्दर चूनरी शोभायमान है एवं दोनों के सिर तिरछे होकर परस्पर मिले हुए शोभा दे रहे हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि श्यामसुन्दर एवं किशोरी जी गले में परस्पर बाँह डाले हुए हैं। समीप में ही ब्रजांगनाएँ खड़ी हैं एवं प्रिया प्रियतम एक दूसरे की ओर कटाक्षपात करते हुए देख रहे हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 55-56

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
