# जो राधा प्राणाधार, जो जीवन धन ब्रजनार।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-shatak-2005:yugal-shatak-2005-kirtan-047
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Book: Yugal Shatak
Source edition: 17-hi-2005; SHA-256 65e97712a464ad9a811875abe92d7ad166ef58f82c9b675cf4d010c1c940a7f7
Source PDF pages: 103–105



<a id="line-1"></a>जो राधा प्राणाधार, जो जीवन धन ब्रजनार।  
<a id="line-2"></a>जो पूर्ण ब्रह्म साकार, सोइ मम पिय नंदकुमार॥  
<a id="line-3"></a>जो ब्रज बनितन मनहार, जो जीव जीवनाधार।  
<a id="line-4"></a>जो है कुब्जा को यार, सोइ मम पिय नंदकुमार॥  
<a id="line-5"></a>जो सत चित सुखघन सार, चितघन सुखघन तन धार।  
<a id="line-6"></a>बह रोम रोम रस धार, सोइ मम पिय नंदकुमार॥

<a id="line-7"></a>जो वृंदाविपिन मझार, सँग लै कोटिन ब्रजनार।  
<a id="line-8"></a>कर नित नव रास बिहार, सोइ मम पिय नंदकुमार॥  
<a id="line-9"></a>जो दीनन को रखवार, जो पतितन को पतवार।  
<a id="line-10"></a>जो निराधार आधार, सोइ मम पिय नंदकुमार॥  
<a id="line-11"></a>जो प्रेम रूप रस सार, लखि कोटि काम बलिहार।  
<a id="line-12"></a>छवि निज मन मोहनहार, सोइ मम पिय नंदकुमार॥  
<a id="line-13"></a>जो मोर मुकुट सिर धार, लटकारी अति घुँघुरार।  
<a id="line-14"></a>भल मृगमद तिलक लिलार, सोइ मम पिय नंदकुमार॥  
<a id="line-15"></a>जो कानन कुण्डल धार, नासा बेसर छविदार।  
<a id="line-16"></a>दृग चितवनि जादू डार, सोइ मम पिय नंदकुमार॥  
<a id="line-17"></a>जो दोउ कर कंकण धार, अँगुरिन मुँदरिन छविदार।  
<a id="line-18"></a>गल भल दुकूल रिझवार, सोइ मम पिय नंदकुमार॥  
<a id="line-19"></a>जो गल वनमाला धार, भल मणिन मोतियन हार।  
<a id="line-20"></a>छवि गंुंजमाल बलिहार, सोइ मम पिय नंदकुमार॥  
<a id="line-21"></a>जो तनु पीतांबर धार, कटि मणि किंकिणि छविदार।  
<a id="line-22"></a>पग नूपुर धुनि झनकार, सोई “कृपालु” मम यार॥

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-23"></a>भावार्थ—भक्त कहता है-जो श्री राधा के प्राणों के प्राण हैं,  
<a id="line-24"></a>जो ब्रजबनिताओं के जीवन-स्वरूप हैं, जो चिदानंदमय सुख समूह  
<a id="line-25"></a>हैं, जिनका दिव्य शरीर भी ज्ञान एवं सुख का घनीभूत रूप है,  
<a id="line-26"></a>जिनके प्रत्येक रोम से रस की धारा प्रवाहित होती रहती है, वे ही  
<a id="line-27"></a>नंदनंदन मेरे प्रियतम हैं। जो वृन्दावन के मध्य करोड़ों ब्रज-युवतियों  
<a id="line-28"></a>को साथ लेकर नवीन रास विहार करते रहते हैं, वे ही नन्दपुत्र  
<a id="line-29"></a>कृष्ण मेरे एकमात्र प्रियतम हैं। दीन-जन ही जिनकी कृपा के विशेष

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<a id="line-30"></a>पात्र हैं, पतितों का उद्धार करने के लिये जो पतवार की ही भाँति  
<a id="line-31"></a>हैं। निराधारों के आधार रूप वे ही श्रीकृष्ण मेरे प्रियतम हैं। जो  
<a id="line-32"></a>अलौकिक प्रेम, रूप एवं रस के सार स्वरूप हैं। जिनकी अतुलनीय  
<a id="line-33"></a>सौन्दर्य राशि को देखकर करोड़ों कामदेव भी बलिहार जाते हैं,  
<a id="line-34"></a>जिनकी शोभा उनके ही मन को मोहित करने वाली है, वे ही  
<a id="line-35"></a>नंदनंदन श्री कृष्ण मेरे प्रियतम हैं। जो मस्तक पर मोर पंख का  
<a id="line-36"></a>मुकुट धारण करते हैं, जिनकी केशराशि, अत्यन्त काली एवं घुँघराली  
<a id="line-37"></a>है, जिनके ललाट पर सुन्दर कस्तूरी का तिलक लगा हुआ है, वे  
<a id="line-38"></a>ही श्रीकृष्ण मेरे प्रियतम हैं। जो कानों में सुन्दर कुण्डल धारण  
<a id="line-39"></a>करते हैं, जिनकी नासिका बुलाक से सुशोभित है, जिनके नेत्रों की  
<a id="line-40"></a>चितवन अपने भक्तों पर जादू करती है, वे ही नंदकुमार मेरे प्रियतम  
<a id="line-41"></a>हैं। जिनके दोनों कर कंकणों से छविमान हैं, हाथ की उँगलियाँ  
<a id="line-42"></a>अँगूठियों से सुन्दर प्रतीत हो रही हैं, जिनके गले का पीताम्बर  
<a id="line-43"></a>भक्तों के मन को आकर्षित करता रहता है, वे ही श्रीकृष्ण मेरे  
<a id="line-44"></a>एकमात्र प्रियतम हैं। जिनके कण्ठ में वनमाला है, अनेक प्रकार के  
<a id="line-45"></a>मणियों एवं मोतियों के हार भी मनोहर लग रहे हैं, गुंजमाल की  
<a id="line-46"></a>शोभा पर तो मैं बलिहार जाता हूँ, ये ही मेरे प्रियतम हैं। जिनके  
<a id="line-47"></a>अंगों पर पीताम्बर फहरा रहा है, सूक्ष्म कटि मणिजटित किंकिणी  
<a id="line-48"></a>से दीप्तिमती हो उठी है, चरणों में नूपुर की धुनि झंकृत हो रही है  
<a id="line-49"></a>श्री कृपालुजी कहते हैं- ऐसे श्रीकृष्ण ही मेरे एकमात्र प्रियतम हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
