# तोसों नहिं बोलूँ अब भूलेहुँ लम्पट,

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-shatak-2005:yugal-shatak-2005-kirtan-041
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Book: Yugal Shatak
Source edition: 17-hi-2005; SHA-256 65e97712a464ad9a811875abe92d7ad166ef58f82c9b675cf4d010c1c940a7f7
Source PDF pages: 92–93



<a id="line-1"></a>तोसों नहिं बोलूँ अब भूलेहुँ लम्पट,  
<a id="line-2"></a>मोते न लिपट चलु हट हट लम्पट।  
<a id="line-3"></a>खोलो न घुँघट पट छुवो जनि लम्पट,  
<a id="line-4"></a>जानि गइ तोहिं पहिचानि गइ लम्पट।  
<a id="line-5"></a>““तू ही मेरी प्यारी”” सब ते ही कह लम्पट,  
<a id="line-6"></a>इक छोड़त इक पकड़त लम्पट।  
<a id="line-7"></a>झूठ ही तेरा खाना पीना सोना लम्पट,  
<a id="line-8"></a>झूठ का ही अवतार जानि परे लम्पट।  
<a id="line-9"></a>मारे दृग बान तान नैनन लम्पट,  
<a id="line-10"></a>लागे जाय उर पट जाने कैसे लम्पट।  
<a id="line-11"></a>सब की तू सौहैं खाय कहे नित लम्पट,  
<a id="line-12"></a>तोसों ही करूँगो ब्याहु बोले झूठ लम्पट।  
<a id="line-13"></a>तूने किया सिद्ध वशीकार सिद्धि लम्पट,  
<a id="line-14"></a>याते जो भी देखे सोइ मोहे झट लम्पट।  
<a id="line-15"></a>नारी जाति ही न मोहे तोहिं लखि लम्पट,  
<a id="line-16"></a>योगीराज शिव धारे नारी तनु लम्पट।  
<a id="line-17"></a>नारी बनि दंडक वन मुनि लम्पट,  
<a id="line-18"></a>आये येहि ब्रज मोहे तोहिं लखि लम्पट।  
<a id="line-19"></a>नारी तनु धरि अग्नि पुत्र जन लम्पट,  
<a id="line-20"></a>तोहिं लखि मारे गये मौत बिनु लम्पट।  
<a id="line-21"></a>बड़े-बड़े ऋषि मुनि मोहे काम लम्पट,  
<a id="line-22"></a>सोऊ गयो काम ते “कृपालु” लखि लम्पट।

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-23"></a>भावार्थ—कोई ब्रजगोपी श्रीकृष्ण से कहती है-हे लम्पट कृष्ण!  
<a id="line-24"></a>मैं अब भूलकर भी तुमसे बात नहीं करूँगी। तुम मुझसे मत लिपटो।  
<a id="line-25"></a>दूर हटो। मेरे घूँघट को मत खोलो। मुझे स्पर्श भी मत करना। मैंने  
<a id="line-26"></a>तुम्हें जान लिया। भली प्रकार से पहचान लिया। तुम सब गोपियों  
<a id="line-27"></a>से यही कहते हो कि एकमात्र तू ही मुझे सबसे अधिक प्रिय है।  
<a id="line-28"></a>इस प्रकार एक को छोड़कर दूसरी से प्रेम-व्यवहार जोड़ते हो।  
<a id="line-29"></a>तुम्हारा खाना, पीना, सोना, सब ही झूठा है। मुझे तो ऐसा प्रतीत  
<a id="line-30"></a>होता है कि तुम झूठ के ही अवतार हो। हे लम्पट! अपने नेत्रों से  
<a id="line-31"></a>चितवन के बाण चलाते हो। मुझे आश्चर्य होता है कि वे हृदय पर  
<a id="line-32"></a>प्रहार कैसे करते हैं। श्यामसुन्दर की चितवन को तो गोपी के नेत्र  
<a id="line-33"></a>देखते हैं, प्रभाव हृदय पर पड़ता है। निरन्तर सभी की सौगन्ध खाते  
<a id="line-34"></a>रहते हो। प्रत्येक ब्रज-बाला से कहते फिरते हो कि मैं तुझसे ही  
<a id="line-35"></a>विवाह करूँगा। इस प्रकार सबसे झूठ बोलते हो। हे लम्पट! मुझे  
<a id="line-36"></a>तो ऐसा प्रतीत होता है कि तुमने वशीकार सिद्धि को सिद्ध कर  
<a id="line-37"></a>लिया है। अतः जो भी कोई ब्रजांगना तुम्हें देखती है, वह मोहित  
<a id="line-38"></a>हो जाती है। अरे कृष्ण! तुम्हें देखकर केवल स्त्रियाँ ही मोहित  
<a id="line-39"></a>नहीं होती, योगेश्वर शिव भी तुम्हारे रास में सम्मिलित होने के  
<a id="line-40"></a>लिये नर से नारी बन गये। दंडकवन के ऋषि भी गोपी बनकर  
<a id="line-41"></a>ब्रजमंडल में आये और तुम्हें देखकर मोहित हो गये। अग्निपुत्र भी  
<a id="line-42"></a>गोपी रूप धारण कर ब्रज में तुम्हारी छवि को निहारकर अपना  
<a id="line-43"></a>सर्वस्व न्यौछावर कर बैठे। श्री कृपालुजी कहते हैं- हे श्रीकृष्ण!  
<a id="line-44"></a>जिस कामदेव ने बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों को मोहित कर लिया वह  
<a id="line-45"></a>भी तुम्हें देखकर बेकाम हो गया।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
