# ना री जाने यारी वारी वारी बनवारी।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

Source ID: native-yugal-ras-2005:yugal-ras-2005-kirtan-059
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Book: Yugal Ras
Source edition: 16-hi-2005; SHA-256 4bb470b1f96249e40eb21d96cd2bb6b8eec203f5ed370df4843197140ad5ea16
Source PDF pages: 126–128



<a id="line-1"></a>ना री जाने यारी वारी वारी बनवारी।  
<a id="line-2"></a>तो भी वारी वारी जाँय सब ब्रजनारी।  
<a id="line-3"></a>श्रुति महँ कह यद्यपि बनवारी।  
<a id="line-4"></a>सब व्रत तजु बनु मम व्रतधारी।  
<a id="line-5"></a>पै नहिं लख आपुहिं बनवारी।  
<a id="line-6"></a>नित नव नव कर अगनित प्यारी।  
<a id="line-7"></a>गीतादिक महँ कह बनवारी।  
<a id="line-8"></a>त्यों हौं भज ज्यों भज मम प्यारी।  
<a id="line-9"></a>पुनि कत गये ब्रज तजि बनवारी।  
<a id="line-10"></a>तलफति रहिं पल पल ब्रजनारी।  
<a id="line-11"></a>जाय बसि गये द्वारिका बनवारी।  
<a id="line-12"></a>किय सोरह सहस सौ आठ नारी।  
<a id="line-13"></a>जोइ कह ममता तजु सुत नारी।  
<a id="line-14"></a>दस दस सुत तिन नारी सारी।  
<a id="line-15"></a>जोइ कह जग तजु भजु बनवारी।  
<a id="line-16"></a>सोइ कनक महल दिये प्रति नारी।  
<a id="line-17"></a>छल लिया हमहिँ छल बनवारी।

<a id="line-18"></a>अब नहिं आवहिँ छल बनवारी।  
<a id="line-19"></a>नहिं रसिक वसिक कछु बनवारी।  
<a id="line-20"></a>मीठी बोलनि उर विष धारी।  
<a id="line-21"></a>सच कह “कृपालु” तू ब्रजनारी।  
<a id="line-22"></a>तबहूँ तजि सक नहिं बनवारी॥

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-23"></a>भावार्थ—कोई सखी कह रही है- यद्यपि श्री कृष्ण  
<a id="line-24"></a>प्रीति-रीति का निर्वाह भली भाँति करना नहीं जानते फिर भी  
<a id="line-25"></a>सभी ब्रजगोपियाँ उन पर बलिहार जाती हैं। यद्यपि वेद में श्री  
<a id="line-26"></a>कृष्ण कहते हैं- सभी जीवात्माओं को अन्य सभी धर्मों का  
<a id="line-27"></a>परित्याग कर एकमात्र मेरी ही शरण में आना चाहिये-““सर्वधर्मान्  
<a id="line-28"></a>परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज””जीवात्माओं के लिये तो यह उपदेश  
<a id="line-29"></a>है परन्तु स्वयं श्री कृष्ण इस धर्म का पालन नहीं करते, वे तो  
<a id="line-30"></a>निरन्तर नई नई प्रेयसी बनाकर उनसे प्रेम करते हैं। गीता में श्री  
<a id="line-31"></a>कृष्ण कहते हैं-““ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।””जो  
<a id="line-32"></a>मुझे जितनी मात्रा में जिस भाव से भजता है मैं भी उसे उतनी  
<a id="line-33"></a>ही मात्रा में उसी भाव से भजता हूँ। ब्रज की अनन्य प्रेम करने  
<a id="line-34"></a>वाली गोपियों का परित्याग कर मथुरा चले जाने से श्री कृष्ण  
<a id="line-35"></a>अपनी उक्त प्रतिज्ञा का पालन नहीं कर सके। वियोगिनी  
<a id="line-36"></a>ब्रजांगनायें पल पल तड़पती ही रहीं। मथुरा से भी द्वारिका जाकर  
<a id="line-37"></a>बस गये। वहाँ सोलह हजार एक सौ आठ विवाह किये। जो  
<a id="line-38"></a>श्री कृष्ण पति, पुत्र, धन आदि को प्रेम-पथ में बाधक बताते हैं  
<a id="line-39"></a>उन्होंने द्वारिका में प्रत्येक रानी से दस दस पुत्र उत्पन्न किये।

Published Hindi meaning — सुश्री ब्रजकुंजरी देवी

<a id="line-40"></a>जो दूसरों से कहते हैं- ““संसार का त्यागकर ईश्वर की आराधना  
<a id="line-41"></a>करो”” उन्होंने अपनी प्रत्येक रानी को स्वर्ण-भवन प्रदान किये।  
<a id="line-42"></a>अब तक तो हम इन श्री कृष्ण के छल से छली गईं किंतु अब  
<a id="line-43"></a>भविष्य में कभी इनकी बातों में नहीं आवेंगी। श्यामसुन्दर रसिक  
<a id="line-44"></a>नहीं है। इनकी वाणी तो मधुर है परन्तु हृदय विष से परिपूर्ण  
<a id="line-45"></a>है।“कृपालु”सखी से कहते हैं- हे सखी! ऐसा होने पर भी तू  
<a id="line-46"></a>श्यामसुन्दर का परित्याग नहीं कर सकती।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Ras scan is a separate source, not the scan transcribed here. Supplied edition: Fourth edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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Unofficial source transcription. Roman transliteration is not an English translation. No missing meanings are generated.
