# साधना करु साधना करु साधना करु प्यारे।

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

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Book: Yugal Madhuri
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Source PDF pages: 227–230



<a id="line-1"></a>साधना करु साधना करु साधना करु प्यारे।  
<a id="line-2"></a>साधना ते ही मिले तोहिं, साध्य हरि रति प्यारे।  
<a id="line-3"></a>प्रथम श्रद्धा युक्त हो जा, शरण गुरु पद प्यारे।  
<a id="line-4"></a>गुरु की बुधि में जोड़ निज बुधि, है शरण यह प्यारे।

<a id="line-5"></a>ग्रन्थ पढ़ु जनि बहुत सुनु जनि, संत मत बहु प्यारे।  
<a id="line-6"></a>ब्रह्म माया जीव का करु, ज्ञान गुरु सों प्यारे।  
<a id="line-7"></a>सेव्य सों सम्बन्ध अपनो, जानु गुरु सों प्यारे।  
<a id="line-8"></a>हरि में गुरु में भेद जनि, लवलेश मानहु प्यारे।  
<a id="line-9"></a>साधना में है प्रमुख मन, इन्द्रियाँ नहिं प्यारे।  
<a id="line-10"></a>मोक्ष अरु बंधन का कारण, एक मन ही प्यारे।  
<a id="line-11"></a>प्रथम करु हरि ध्यान मन ते, जैसी रुचि हो प्यारे।  
<a id="line-12"></a>ध्यान ही है साधना का, प्राण जीवन प्यारे।  
<a id="line-13"></a>ध्यान बिनु सब साधना है, प्राण बिनु तनु प्यारे।  
<a id="line-14"></a>मन को जो भाये बना लो, रूप वैसा प्यारे।  
<a id="line-15"></a>मनहिं ते शृंगार करु सब, जैसा भाए प्यारे।  
<a id="line-16"></a>सामने हरि को बिठा कर, साधना करु प्यारे।  
<a id="line-17"></a>नाम गुण लीलादि कीर्तन, साथ में करु प्यारे।  
<a id="line-18"></a>परम व्याकुलता बढ़ाओ, हरि दरस की प्यारे।  
<a id="line-19"></a>रो के उनते प्रेम माँगो, दरस माँगो प्यारे।  
<a id="line-20"></a>ह्वै के अति व्याकुल करहु नित, करुण क्रन्दन प्यारे।  
<a id="line-21"></a>दरस हित लग एक पलहूँ, कलप सम तोहिं प्यारे।  
<a id="line-22"></a>जितनो तू कर प्यार तितनो, प्यार कर तोहिं प्यारे।  
<a id="line-23"></a>प्यार ही सों प्यार कर पिय, प्यार चाकर प्यारे।

<a id="line-24"></a>जगत ते मन को हटा कर, लगा हरि में प्यारे।  
<a id="line-25"></a>इसी का अभ्यास पुनि पुनि, करु निरन्तर प्यारे।  
<a id="line-26"></a>श्वास जब खींचो तो “रा” कहु, मनहिं मन महँ प्यारे।  
<a id="line-27"></a>श्वास छोड़ो तो कहहु “धे”, ध्यान भी करु प्यारे।  
<a id="line-28"></a>जग में कतहूँ राग जनि करु, द्वेष जनि करु प्यारे।  
<a id="line-29"></a>मन को मानो शत्रु उसकी, सुनहु जनि कछु प्यारे।  
<a id="line-30"></a>मन जहाँ भी जाय हरि को, खड़ो करु तहँ प्यारे।  
<a id="line-31"></a>गौर रस अरु श्याम रस दोउ, एक करि पिउ प्यारे।  
<a id="line-32"></a>रस की शीशी में युगल रस, भर के पी नित प्यारे।  
<a id="line-33"></a>ना भरे ना खाली हो अस, रस की प्याली प्यारे।  
<a id="line-34"></a>चर अचर में लखहु अपनो, इष्ट कहँ नित प्यारे।  
<a id="line-35"></a>सर्वदा सर्वत्र हरि को, साथ मानहु प्यारे।  
<a id="line-36"></a>आपु को इकलो कबहुँ जनि, मानु मन महँ प्यारे।  
<a id="line-37"></a>सोचु मन यह कर्म मम सब, लखत हरि गुरु प्यारे।  
<a id="line-38"></a>माँगु जनि उन भुक्ति मुक्तिन, भूलिहूँ तुम प्यारे।  
<a id="line-39"></a>उनकी सेवा ही चहहु नित, अष्टयामी प्यारे।  
<a id="line-40"></a>उनका सुख ही चहहु निशि दिन, सुख न निज चहु प्यारे।  
<a id="line-41"></a>उनकी इच्छा में ही अपनी, राखु इच्छा प्यारे।  
<a id="line-42"></a>तन ते मन ते धन ते गुरु की, करहु सेवा प्यारे।

<a id="line-43"></a>तृण ते बढ़कर दीनता उर, राखु नित ही प्यारे।  
<a id="line-44"></a>वृक्ष ते बढ़कर दीनता उर, राखु नित ही प्यारे।  
<a id="line-45"></a>सब को दो सम्मान आपुन, मान जनि चहु प्यारे।  
<a id="line-46"></a>भूलिहूँ दुर्भावना कहुँ, हो न सपनेहुँ प्यारे।  
<a id="line-47"></a>लखहु जनि परदोष कबहूँ, दोष निज लखु प्यारे।  
<a id="line-48"></a>सदा सोचहु जाने कब छिन, जाय तनु यह प्यारे।  
<a id="line-49"></a>हरि में गुरु में ही रहे नित, रक्त तव मन प्यारे।  
<a id="line-50"></a>हरि दरस दे या न दे तुम, रोते जाओ प्यारे।  
<a id="line-51"></a>एक दिन अइहैं इहै, विश्वास राखहु प्यारे।  
<a id="line-52"></a>कृपा की नित बाट जोहो, कृपा होगी प्यारे।  
<a id="line-53"></a>कबहुँ तो लैहैं कृपा करि, सुधि “कृपालुहुँ” प्यारे।

Original Hindi songs from the supplied standalone Yugal Madhuri edition. This is distinct from Prem Ras Madira's similarly named chapter. Frontmatter retains its own source credits. Supplied edition: Fifth edition, Gita Jayanti, 28 November 2009.

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